
नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। शहर में नर्मदा व बोरिंग के पेयजल की जांच के लिए मूसाखेड़ी में दो सरकारी लैब है। नियमानुसार 10 हजार की आबादी में एक पानी के नमूने लेकर जांच किया जाना चाहिए। इंदौर की यदि 30 लाख की आबादी माने तो प्रतिदिन 300 पानी के नमूने लेकर उसकी जांच लैब में होनी चाहिए। हकीकत यह है कि इंदौर नगर निगम की नर्मदा पेयजल की 105 टंकियों के माध्यम से जिन रहवासी क्षेत्रों में जल प्रदाय होता है, वहां से सैंपल एकत्र करने वाले पीएचई के कर्मचारी रिटायर हो गए, अब कर्मचारी नहीं है। यही वजह है कि यह व्यवस्था लंबे समय से ठप्प पड़ी है।
पांच साल पहले तक मूसाखेड़ी स्थित नगर निगम की पानी जांच प्रयोगशाला में प्रतिमाह 600 से 700 पानी के सैंपल जांच के लिए पहुंचते थे। वही अब एक माह में 100 से 150 पानी के सैंपल ही जांच के लिए आ रहे है। भागीरथपुरा कांड के बाद नगर निगम के अधिकारियों ने शहर के अलग-अलग इलाकों से पानी की जांच की गति बढ़ाई है। 1 जनवरी से इस लैब में 30 से 40 पानी के सैंपल प्रतिदिन जांच के लिए पहुंच रहे है। हालांकि वाटर मैन्युअल के मुताबिक जहां प्रतिदिन शहर के 300 पानी सैंपल जांच के लिए पहुंचना चाहिए। मूसाखेड़ी में संचालित निगम की लैब को 2029 के लिए एनएबीएल प्रमाण पत्र मिला है।
इंदौर में नर्मदा के प्रथम चरण 1980 में आया था। उसी दौरान लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग ने मूसाखेड़ी में नर्मदा जल प्रदाय की निगरानी व जांच के लिए प्रयोगशाला का निर्माण किया था। वर्ष 2000 से नगर निगम द्वारा इसका संचालन किया जा रहा है। वर्ष 2023 में इस लैब को एनएबीएल सर्टिफिकेट वर्ष 2029 तक के लिए मिला है। इसके अलावा ग्रामीण क्षेत्र के पेयजल की जांच के लिए पीएचई ग्रामीण की एक अन्य लैब भी मूसाखेड़ी में संचालित हो रही है। पूर्व में यह लैब कलेक्टर कार्यालय में संचालित होती थी। लैब में पेयजल की 15 से अधिक मापदंडों पर जांच होती है।
रंग, गंध, स्वाद, अमोनिया, क्लोराइड, फ्लोराइड, घुलनशील क्लोरीन, आयरन, नाइट्रेट, सल्फेट, टीडीएस, क्षारीयता, हार्डनेस, मटमैलापन सहित 15 तरह की जांच के लिए मान्यता प्राप्त है। इसके अलावा इस लैब में दूषित पानी में बीओडी, सीओडी, फिकल कालीफार्म, टोटल कालीफार्म बैक्टीरिया की जांच की जाती है। ब्लीचिंग पाउडर व हाइपो सोल्यूशन में क्लोरीन व पानी में कैल्शियम व मैग्नीशियम की जांच की जाती है। लैब में स्टाफ की संख्या कम हुई है; पहले यहाँ 12 लोगों का स्टाफ था जो अब घटकर मात्र 6 रह गया है। नगर निगम मुख्यालय परिसर की लैब भी बंद है। पानी के 16 पैरामीटर व जीवाणु परीक्षण का जांच शुल्क 2180 रुपये है।
भागीरथपुरा की गलियों में दूषित पानी से 20 लोगों की मौत के मातम की गूंज ने पूरे देश को दहला दिया, लेकिन मालवा-निमाड़ के कुछ जिलों में प्रशासन अब भी गहरी नींद में है। संभाग के बड़े शहरों की जल प्रदाय व्यवस्था की पड़ताल में चौंकाने वाली लापरवाही सामने आई है। जहां एक ओर खंडवा और बड़वानी जैसे शहर "ट्रिपल लेयर" सुरक्षा का दावा कर रहे हैं, वहीं धार, रतलाम और खरगोन जैसे जिलों में फिल्टर प्लांट केवल "शो-पीस" बनकर रह गए हैं। कहीं केमिस्ट का पद रिक्त होने के कारण वैज्ञानिक मापन के बजाय महज "अनुमान" के आधार पर रसायनों का घोल तैयार किया जा रहा है।
धार शहर को प्यास बुझाने वाले सीतापाट रोड स्थित फिल्टर प्लांट की व्यवस्था तकनीकी खामियों के बीच चल रही है। परिसर में प्रयोगशाला तो उपलब्ध है, लेकिन केमिस्ट और पर्याप्त संसाधनों के अभाव में पानी शुद्ध करने के लिए रसायनों का उपयोग वैज्ञानिक मापन के बजाय केवल "अनुमान" के आधार पर किया जा रहा है। वहीं रतलाम के मोरवानी फिल्टर प्लांट पर कलेक्टर मिशा सिंह द्वारा किए गए औचक निरीक्षण में गंभीर लापरवाही सामने आई है। जांच के दौरान लैब में जल शोधन के लिए आवश्यक कई रसायन (केमिकल) नदारद मिले, जिस पर कार्यपालन यंत्री सहित पांच उपयंत्रियों को नोटिस जारी किए गए हैं।
खरगोन में पेयजल शुद्धता के लिए नगर पालिका निजी एजेंसी के भरोसे है, जिसकी रिपोर्ट आने में पांच दिन लगते हैं। इसके विपरीत, खंडवा नगर निगम अलर्ट पर है और चारखेड़ा फिल्टर प्लांट पर प्रतिदिन टेस्टिंग के साथ "ट्रिपल लेयर" चेकिंग की जा रही है। बड़वानी नगर पालिका प्रशासन भी पेयजल की शुद्धता को लेकर पूरी तरह चौकस है। शहर की सात टंकियों के माध्यम से होने वाली जलापूर्ति की सघन निगरानी की जा रही है। नर्मदा किनारे स्थित फिल्टर प्लांट से लेकर वितरण तक का पूरा कार्य नपा स्वयं के अमले से करा रही है और प्रतिदिन 10 से 15 सैंपल लेकर लैब में जांच कराई जा रही है।