
नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। भागीरथपुरा में दूषित पानी पीने से पीड़ित अधिकांश मरीजों को निजी अस्पतालों में भर्ती करवाने का प्रशासन का फैसला सवालों के घेरे में है। आखिर क्यों शासकीय अस्पतालों की व्यवस्था पर स्वयं प्रशासन को ही भरोसा नहीं है? जबकि सरकार और प्रशासन इन अस्पतालों की तारीफों के पुल बांधते नहीं थकते। क्या शासकीय अस्पतालों की स्थिति इतनी खराब है कि मरीजों को निजी अस्पतालों में भेजना पड़ रहा है? इस फैसले से शासकीय अस्पतालों की क्षमता और गुणवत्ता पर सवाल उठ रहे हैं।
भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पानी के कारण हालात गंभीर हो गए हैं। अब तक इससे 17 लोगों की मौत हो चुकी है और तीन हजार से अधिक लोग बीमार हो चुके हैं। इनमें से 411 मरीजों की हालत ऐसी रही कि उन्हें अस्पताल में भर्ती करना पड़ा। प्रशासन ने अधिकांश मरीजों को निजी अस्पतालों में ही भर्ती करवाया। अभी भी 110 मरीज अस्पतालों में भर्ती हैं। इनमें से 15 से अधिक मरीजों की हालत गंभीर बनी हुई है और उन्हें आइसीयू में रखा गया है।
इन सभी गंभीर मरीजों को बड़े निजी अस्पतालों में भर्ती कराया गया है। जो मरीज शासकीय अस्पतालों में गंभीर अवस्था में भर्ती थे, उन्हें भी एक ही जगह निजी अस्पताल में शिफ्ट कर दिया है। जबकि शासकीय अस्पतालों में भी आइसीयू व उपचार की यूनिट मौजूद है। डॉक्टरों की बड़ी टीम भी है, लेकिन इलाज उचित नहीं मिलता है।
निजी अस्पताल से बेहतर इलाज की सुविधा देने का दावा करने वाले सुपर स्पेशिएलिटी अस्पताल में अब तक एक भी मरीज भर्ती नहीं किया गया है। जबकि यहां आधुनिक मशीन और विशेषज्ञ उपलब्ध हैं। करोड़ों रुपये खर्च कर बनाए गए इस अस्पताल और आइसीयू यूनिट संकट के समय ही काम नहीं आ रहे हैं। वहीं एमवाय अस्पताल में भी अब तक करीब 30 मरीजों को ही उपचार के लिए भेजा गया। उन्हें भी बाद में निजी अस्पतालों में शिफ्ट कर दिया गया। यानी प्रशासन खुद मानता है कि शासकीय अस्पतालों में इलाज की पर्याप्त और भरोसेमंद व्यवस्था नहीं है। इस पर अधिकारियों का तर्क है कि वे इंदौर में किसी भी अस्पताल में भर्ती हो सकते हैं।