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ऐसी कैसी निगरानी? भागीरथपुरा के ज्यादातर हिस्से में पानी और ड्रेनेज की लाइनें एक साथ, करोड़ों में दिया था निगरानी का ठेका

Indore Water Tragedy: भागीरथपुरा में दूषित पानी से हुई मौतों के बाद अब नगर निगम के 'अमृत प्रोजेक्ट' में हुई भारी लापरवाही उजागर हुई है। जाँच में सामने...और पढ़ें

By Kuldeep BhawsarEdited By: Dheeraj Belwal
Publish Date: Sat, 03 Jan 2026 11:06:32 PM (IST)Updated Date: Sat, 03 Jan 2026 11:06:32 PM (IST)
ऐसी कैसी निगरानी? भागीरथपुरा के ज्यादातर हिस्से में पानी और ड्रेनेज की लाइनें एक साथ, करोड़ों में दिया था निगरानी का ठेका
ऐसी कैसी निगरानी?

HighLights

  1. निगम की मिलीभगत से बली चढ़ी जनता
  2. निगरानी के नाम पर करोड़ों का भुगतान
  3. पर ड्रेनेज में मिली रही पानी की लाइन

नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। भागीरथपुरा में दूषित पानी से हुई मौतों के बाद अब नगर निगम के 'अमृत प्रोजेक्ट' में हुई भारी लापरवाही उजागर हुई है। जाँच में सामने आया है कि जिस ड्रेनेज और पेयजल लाइन को अलग-अलग होना चाहिए था, वे कई जगहों पर एक-दूसरे में मिली हुई हैं।

करोड़ों रुपये डकार गए, पर नहीं की निगरानी

हैरानी की बात यह है कि नगर निगम ने वर्ष 2017 में अमृत योजना के तहत 287 करोड़ रुपये की लागत से लाइन बिछाने का काम शुरू किया था। इस पूरे प्रोजेक्ट की निगरानी और डीपीआर (DPR) तैयार करने के लिए नागपुर की एक एजेंसी को 13 करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान किया गया। एजेंसी की जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करना था कि पेयजल लाइन और ड्रेनेज लाइन के बीच सुरक्षित दूरी रहे, लेकिन ज़मीनी हकीकत में पानी की पाइपलाइन ड्रेनेज के चैंबरों के भीतर से गुज़ार दी गई।


एलएंडटी और निगरानी कंपनी की बड़ी लापरवाही

अमृत प्रोजेक्ट के तहत लाइन बिछाने का ठेका एलएंडटी (L&T) कंपनी को दिया गया था। नियम के मुताबिक, पेयजल लाइन को ड्रेनेज लाइन से दूर बिछाया जाना था ताकि क्रॉस-कंटामिनेशन (दूषित जल मिलन) न हो। न तो काम करने वाली कंपनी ने इसका ध्यान रखा और न ही 13 करोड़ रुपये लेने वाली निगरानी एजेंसी ने इस पर रोक लगाई। लापरवाही का आलम यह है कि आज कई जगहों पर पानी की लाइन के ठीक ऊपर ड्रेनेज के चैंबर बने हुए हैं।

पुरानी लाइनों पर निर्भरता और खुदाई से बढ़ता खतरा

भागीरथपुरा के एक बड़े हिस्से में आज भी दशकों पुरानी लाइनों से पानी की आपूर्ति हो रही है। नई लाइन बिछाने का काम दो चरणों में प्रस्तावित है, जिसमें से पहले चरण का केवल 60 प्रतिशत काम ही पूरा हो पाया है। क्षेत्र में सीमेंट की सड़कें होने के कारण लाइन बिछाने के लिए बड़े ब्रेकरों का उपयोग किया जा रहा है। जानकारों के अनुसार, इस खुदाई और कंपन के कारण पुरानी जर्जर पाइपलाइनें जगह-जगह से फूट रही हैं, जिससे सीवेज का गंदा पानी पेयजल में मिल रहा है।

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सिस्टम की खामी ने ली मासूमों की जान

नगर निगम की जांच में यह स्पष्ट हो गया है कि ड्रेनेज और पानी की लाइनों का साथ-साथ होना ही इस स्वास्थ्य संकट की मुख्य वजह है। करोड़ों रुपये के भुगतान के बावजूद तकनीकी खामियों को नज़रअंदाज़ किया गया, जिसका खामियाज़ा अब भागीरथपुरा के रहवासियों को अपनी जान देकर भुगतना पड़ रहा है।