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जबलपुर में नर्मदा नदी पर बनेगा 150 मीटर लंबा ब्रिज, हेल्थ मॉनिटरिंग सिस्टम के सेंसर से होगी निगरानी

एनएचएआई में यह प्रदेश का पहला केबल ब्रिज है, जो केबल के साथ पिलर पर भी खड़ा है।

By Atul ShuklaEdited By: Nitin Kumar
Publish Date: Sun, 11 Oct 2026 03:52:03 PM (IST)Updated Date: Sun, 11 Oct 2026 03:52:03 PM (IST)
जबलपुर में नर्मदा नदी पर बनेगा 150 मीटर लंबा ब्रिज, हेल्थ मॉनिटरिंग सिस्टम के सेंसर से होगी निगरानी
नर्मदा ब्रिज मार्च 2027 तक बनकर होगा तैयार, नईदुनिया

HighLights

  1. आउटर रिंग रोड परियोजना का 75 फीसदी काम पूरा
  2. नर्मदा ब्रिज मार्च 2027 तक बनकर होगा तैयार
  3. हेल्थ मॉनिटरिंग सिस्टम के सेंसर से होगी निगरानी

नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। जबलपुर की 114 किलोमीटर लंबी आउटर रिंग रोड परियोजना का करीब 75 प्रतिशत काम पूरा हो चुका है। लगभग 3500 करोड़ रुपये की इस परियोजना में नर्मदा नदी पर 150 मीटर स्पान पर एक्स्ट्राडोज्ड ब्रिज बनाया जा रहा है।

इसे मार्च 2027 तक पूरा करने का लक्ष्य है। वहीं, अमझर से बरेला तक के पांचवें पैकेज में करीब 30 प्रतिशत काम हुआ है, जिसे दिसंबर 2027 तक पूरा करने का प्रयास किया जा रहा है। रिंग रोड बनने से शहर के भीतर भारी वाहनों का दबाव कम होने और प्रमुख राजमार्गों के बीच कनेक्टिविटी बेहतर होने की उम्मीद है।


ब्रिज की तकनीकी बारीकियों का निरीक्षण

यह जानकारी शनिवार को एनएचएआई के अधिकारियों ने पत्रकारों के साथ रिंग रोड़ निर्माण के निरीक्षण के दौरान कही। उन्होंने बरेला से मनेगांव के बीच नर्मदा नदी पर बन रहे केबल ब्रिज की तकनीकी बारीकियों को देखा और पत्रकारों के सवालों के जवाब दिए।

एनएचएआई के प्रोजेक्ट प्रभारी पीयूष रंजन ने दावा किया कि एनएचएआई में यह प्रदेश का पहला केबल ब्रिज है, जो केबल के साथ पिलर पर भी खड़ा है। करीब एक किमी लंबे इस ब्रिज का मुख्य भाग में लगे पिलर के बीच करीब 150 मीटर की दूरी है, जो इसे और मजबूत और आकर्षित बनाता है।

उन्होंने बताया कि इस केबल ब्रिज का निर्माण पूरा होने के बाद इसमें एडवांस हेल्थ मानिटरिंग सिस्टम के सेंसर लगाए जाएंगे। इनसे पुल के झुकाव और केबलों के तनाव में होने वाले बदलावों की रियल टाइम निगरानी की जाएगी।

डेटा को एटीएमएस कंट्रोल सेंटर से जोड़ने की योजना है। अधिकारियों के अनुसार, स्वतंत्र इंजीनियर इसकी निगरानी करेंगे, ताकि संभावित तकनीकी खामियों का समय रहते पता लगाकर सुधारात्मक कदम उठाए जा सकें। अधिकारियों ने पुलों और प्रमुख संरचनाओं की डिजाइन लाइफ करीब 100 वर्ष बताई है।

पुल में लगेंगे प्रोफाइल लाइटिंग

नर्मदा पर बन रहे एक्स्ट्राडोज्ड ब्रिज में 150 मीटर का स्पान रखा गया है। सामान्य तकनीक से 50-50 मीटर के स्पान बनाने पर करीब 10 फाउंडेशन की जरूरत होती, जबकि इस डिजाइन में तीन से चार फाउंडेशन से काम पूरा करने की योजना है।

इससे नदी के भीतर निर्माण करने में लगने वाले अतिरिक्त प्रयास और संसाधनों की बचत होगी। ब्रिज के एक हिस्से में छह केबल लगाने का काम पूरा हो चुका है। पुराने पुल के जीर्णोद्धार और फसाड लाइटिंग का प्रस्ताव भी है, ताकि घाट की ओर से इसका दृश्य आकर्षक दिखाई दे।

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पूरी रिंग रोड पर सर्विस रोड

एनएचएआई के प्रबंधक तकनीकी पारस बंसल ने बताया कि इस पूरे रिंग रोड़ पर सर्विस रोड भी बनाई है। मुख्य सड़क का उपयोग तेज और भारी वाहनों के लिए होगा, जबकि सर्विस रोड से स्थानीय लोगों को आवाजाही की सुविधा मिलेगी।

इससे स्थानीय और तेज गति वाले यातायात के बीच टकराव कम करने में मदद मिल सकती है। मुख्य सड़क से जुड़ने के लिए पैकेज-1 में पांच, पैकेज-2 में छह, पैकेज-3 में आठ और पैकेज-4 में चार प्रवेश-निकास बिंदु रखे गए हैं। पैकेज-5 में एक्सेस कंट्रोल के तहत केवल दो बिंदु प्रस्तावित हैं।

पांच साल तक ठेकेदार की जिम्मेदारी

पत्रकारों से चर्चा करते हुए एनएचएआई के अधिकारियों ने बताया कि निर्माण पूरा होने के बाद पांच साल तक सड़क के रखरखाव की जिम्मेदारी संविदाकार की होगी। इसके बाद सरकार यातायात की संभावनाओं और वित्तीय जरूरतों के आधार पर सामान्य रखरखाव या मुद्रीकरण पर निर्णय लेगी।

उन्होंने नईदुनिया के एक सवाल का जवाब देते हुए कहा कि डामर और सीमेंट-कंक्रीट सड़क में से किस तकनीक का उपयोग किया जाए, यह लागत, यातायात और रखरखाव की जरूरतों पर निर्भर करता है। टायर फटने की घटनाओं के लिए केवल सीसी सड़क को जिम्मेदार नहीं माना जा सकता, तेज गति, टायर का दबाव, ओवरलोडिंग और खराब स्थिति भी इसके कारण हो सकते हैं।

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