
सुरेन्द्र दुबे, नईदुनिया जबलपुर। न्याय की उम्मीद में अदालतों की चौखट पर पहुंचे लाखों लोगों के लिए मुकदमे का फैसला वर्षों तक प्रतीक्षा का विषय बना हुआ है। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की मुख्यपीठ जबलपुर और खंडपीठ इंदौर व ग्वालियर के साथ प्रदेश की अधीनस्थ न्यायपालिका पर भी मुकदमों का भारी बोझ है।
लोकसभा में प्रस्तुत केंद्र सरकार के आंकड़ों के अनुसार, 30 जुलाई 2026 तक मध्य प्रदेश की जिला एवं अधीनस्थ अदालतों में 21,42,280 मामले लंबित थे। इनमें 3,48,670 मामले पांच साल से अधिक और 36,080 मामले दस साल से अधिक समय से लंबित थे।
दरअसल, उक्त आंकड़े महज मुकदमों की संख्या नहीं, बल्कि उन परिवारों, कारोबारियों, कर्मचारियों और आम नागरिकों की प्रतीक्षा का संकेत हैं, जिनके अधिकारों का फैसला अदालतों से होना है। दीवानी विवादों में संपत्ति और उत्तराधिकार का प्रश्न हो या आपराधिक मामलों में न्याय की अपेक्षा, लंबी सुनवाई का असर संबंधित पक्षों के जीवन पर पड़ता है।
कमोवेश न्यायिक व्यवस्था की चुनौतियां केवल लंबित मामलों तक सीमित नहीं हैं। अगस्त 2026 में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने न्यायिक अधोसंरचना से जुड़ी लंबित परियोजनाओं पर राज्य सरकार का ध्यान आकृष्ट करते हुए उन्हें प्राथमिकता से मंजूरी देने की जरूरत बताई। अनूपपुर जिला न्यायालय के भवन से संबंधित जनहित याचिका के संदर्भ में अदालत ने पर्याप्त न्यायिक अधोसंरचना को नागरिकों के न्याय तक पहुंचने के अधिकार से जुड़ा दायित्व माना।
सुनवाई के दौरान राज्य की ओर से बताया गया कि मूल्यांकन समिति ने 17 जुलाई 2026 की बैठक में 45 करोड़ रुपये की मंजूरी की अनुशंसा की थी, लेकिन वित्तीय कारणों से आवंटन में विलंब हुआ। बजट की कमी के कारण न्यायिक भवनों और अन्य परियोजनाओं की मंजूरी लंबित रहने का मुद्दा भी सामने आया।
केंद्र सरकार की ई-कोर्ट्स परियोजना के तीसरे चरण (2023-2027) के लिए 7,210 करोड़ रुपये का बजट स्वीकृत है। इसका उद्देश्य अदालतों में डिजिटल और कागजरहित कामकाज, वीडियो कान्फ्रेंसिंग तथा अभिलेखों के डिजिटलीकरण को बढ़ावा देना है। हालांकि, तकनीक के साथ पर्याप्त न्यायिक अधिकारी, कर्मचारी, न्यायालय कक्ष और प्रभावी प्रकरण प्रबंधन भी जरूरी हैं। अब सवाल जवाबदेही और समयबद्ध सुधार का है।
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लंबित मामलों के जिला-वार विश्लेषण, पुराने मुकदमों की नियमित समीक्षा, रिक्त पदों की स्थिति, नए न्यायालय कक्षों की जरूरत और डिजिटल सुविधाओं के वास्तविक उपयोग का सार्वजनिक आकलन होना चाहिए।
न्याय मिलने में लगने वाला समय कम करना केवल न्यायपालिका की नहीं, बल्कि सरकार, प्रशासन और पूरी न्यायिक व्यवस्था की साझा जिम्मेदारी है। ऐसा इसलिए क्योंकि न्याय में देरी का अर्थ केवल तारीख पर तारीख नहीं, बल्कि नागरिक के अधिकार, समय और भरोसे की लंबी परीक्षा भी है।
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