
सुरेन्द्र दुबे, नईदुनिया जबलपुर। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में लंबित मुकदमों का आंकड़ा अब केवल एक संख्या नहीं रह गया है, बल्कि न्यायिक व्यवस्था की क्षमता पर सीधा सवाल बन गया है। सितंबर 2026 के उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक हाई कोर्ट में 4,94,451 मामले लंबित हैं, जबकि न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या 53 के मुकाबले केवल 38 जज कार्यरत हैं।
इस हिसाब से प्रत्येक कार्यरत जज के हिस्से औसतन 13,012 लंबित मामले आते हैं। यानी एक जज के सामने हर दिन हजारों मुकदमों का ऐसा पहाड़ है, जिसे अकेले सामान्य गति से कम करना आसान नहीं है। सबसे गंभीर पहलू यह है कि स्वीकृत पदों में से 15 पद खाली हैं। यानी स्वीकृत न्यायिक क्षमता का करीब 28 प्रतिशत हिस्सा फिलहाल उपलब्ध नहीं है।
यही कारण है कि मुकदमों के निराकरण की गति बढ़ाने के बावजूद कुल लंबित मामलों पर अपेक्षित असर नहीं पड़ पा रहा है। तुलना करें तो फरवरी 2026 में केंद्र सरकार के आधिकारिक आंकड़ों में हाई कोर्ट की 53 स्वीकृत सीटों में 42 जज कार्यरत बताए गए थे। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि नियुक्तियों के बाद भी सेवानिवृत्ति और अन्य कारणों से रिक्तियां लगातार चुनौती बनी हुई हैं।
लंबित मामलों की उम्र इस संकट को और गंभीर बनाती है। उपलब्ध सितंबर के आंकड़ों में 1,42,322 मामले दस वर्ष से अधिक पुराने हैं। यानी कुल लंबित मामलों का करीब 29 प्रतिशत हिस्सा एक दशक से अधिक समय से न्याय की प्रतीक्षा में है। यह केवल अदालत की फाइल नहीं है। इसके पीछे किसी की संपत्ति, नौकरी, अधिकार, आपराधिक अपील, जमानत या प्रशासनिक निर्णय से जुड़ा विवाद हो सकता है।
हाई कोर्ट में लंबित मामलों का बढ़ता बोझ न्यायिक व्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती बना हुआ है। जुलाई 2025 में 11 नए न्यायाधीशों की नियुक्ति के बाद कार्यरत जजों की संख्या 34 से बढ़कर 45 हो गई थी। इसके बावजूद 53 स्वीकृत पदों में आठ रिक्त थे। बाद की नियुक्तियों और सेवानिवृत्तियों से संख्या में बदलाव हुआ।
अगस्त 2026 में भी एक अतिरिक्त न्यायाधीश नियुक्त किए गए। वर्तमान स्थिति में 53 स्वीकृत पदों के मुकाबले 38 न्यायाधीश और करीब 4.94 लाख लंबित मामले न्यायिक क्षमता पर सवाल खड़े करते हैं। ऐसे में केवल रिक्त पद भरना पर्याप्त समाधान नहीं है।
न्यायालय की दीर्घकालीन क्षमता का पुनर्मूल्यांकन भी जरूरी है। लंबित मामलों का बोझ घटाने के लिए पुराने मुकदमों के निराकरण की अलग रणनीति, प्रभावी केस मैनेजमेंट और अनावश्यक मुकदमेबाजी पर नियंत्रण जैसे उपायों पर एक साथ काम करना होगा।
न्यायिक सुधार अब केवल अदालतों की आंतरिक प्रक्रिया तक सीमित नहीं रह सकता। जब तक न्यायाधीशों की उपलब्ध संख्या और मुकदमों के बोझ के बीच अंतर कम नहीं होगा, लंबित मामलों का पहाड़ छोटा करना बड़ी चुनौती बना रहेगा।
यह भी पढ़ें- ओबीसी आरक्षण पर एमपी हाई कोर्ट में आमने-सामने रहे संविधान, आंकड़े और प्रतिनिधित्व के तर्क