
सुरेन्द्र दुबे, नईदुनिया, जबलपुर। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में जनवरी से जून 2025 के बीच 63,376 प्रकरण ई-फाइलिंग के माध्यम से दाखिल हुए। इसी अवधि में हाई कोर्ट, जिला, तहसील और परिवार न्यायालयों में आनलाइन कोर्ट फीस के रूप में 88.78 करोड़ रुपये जमा हुए।
डिजिटल बदलाव के इन आंकड़ों के बीच बड़ा सवाल है कि तकनीक के विस्तार से आम आदमी का समय, पैसा और संघर्ष कितना कम हुआ। न्यायिक व्यवस्था में लंबित मामलों का बोझ बढ़ा।
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की जनवरी-जून 2025 की आधिकारिक रिपोर्ट के अनुसार, ई-फाइलिंग शुरू होने से 30 जून 2025 तक हाई कोर्ट में कुल 1,88,130 प्रकरण आनलाइन दाखिल किए जा चुके थे। इनमें 63,376 प्रकरण अकेले जनवरी से जून 2025 के बीच दर्ज हुए। इसी अवधि में प्रदेश की जिला अदालतों में ई-फाइलिंग 3.0 के माध्यम से 3,159 प्रकरण दाखिल किए गए। ऑनलाइन कोर्ट फीस का कुल आंकड़ा लगभग 88.78 करोड़ रुपये रहा।
रिपोर्ट के अनुसार, हाई कोर्ट में एक जनवरी 2025 को 4,64,092 प्रकरण लंबित थे। छह महीने में 87,475 नए मामले दर्ज हुए, जबकि 67,641 प्रकरणों का निराकरण किया गया। परिणामस्वरूप 30 जून 2025 तक लंबित मामलों की संख्या बढ़कर 4,83,926 हो गई। इस अवधि में निस्तारण अनुपात 77.32 प्रतिशत रहा।
जिला अदालतों में जनवरी से जून 2025 के बीच 9,61,734 नए प्रकरण दर्ज हुए और 9,38,393 का निराकरण हुआ। लंबित मामलों की संख्या 20,52,363 से बढ़कर 20,75,704 हो गई। यहां निस्तारण अनुपात 97.57 प्रतिशत रहा। ये आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि डिजिटल सुविधाओं के विस्तार के बावजूद लंबित मामलों में कमी अपने आप सुनिश्चित नहीं होती।
जबलपुर मुख्यपीठ, इंदौर और ग्वालियर खंडपीठ के साथ अधीनस्थ अदालतों में ई-फाइलिंग, आनलाइन फीस और वीडियो कांफ्रेंसिंग जैसी सुविधाएं न्यायिक प्रक्रिया को आसान बना सकती हैं। ऑनलाइन प्रकरण स्थिति से जानकारी प्राप्त करना भी सुविधाजनक हुआ है। हालांकि, ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट की उपलब्धता, तकनीकी जानकारी का अभाव और दस्तावेज डिजिटल रूप में तैयार करने की कठिनाई अब भी चुनौती हो सकती है। बुजुर्गों, दिव्यांगों और तकनीकी संसाधनों से वंचित लोगों तक इन सुविधाओं का लाभ पहुंचाना भी जरूरी है
डिजिटल न्याय का वास्तविक प्रभाव जानने के लिए चयनित मुकदमों का ‘न्याय यात्रा लेखा’ तैयार करने की पहल की जा सकती है। इसमें मुकदमे की अवधि, सुनवाइयों की संख्या, स्थगन, पक्षकार की अदालत तक यात्राओं और खर्च का विवरण दर्ज हो। इससे उन प्रक्रियाओं की पहचान हो सकेगी, जिनमें तकनीक के माध्यम से समय और संसाधन बचाए जा सकते हैं।
न्याय व्यवस्था के आधुनिकीकरण की सार्थकता केवल फाइलों को कंप्यूटर तक पहुंचाने में नहीं, बल्कि न्याय को आम आदमी के लिए सुलभ बनाने में है। डिजिटल सुविधाओं की सफलता तभी मानी जाएगी, जब अदालतों के चक्कर कम हों, अनावश्यक खर्च घटे और न्याय पाने की प्रक्रिया अधिक सरल बने।
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