• Jagran.com
  • Jagran Josh
  • Her Zindagi
  • Onlymyhealth
  • Jagran TV
  • Vishvas News
  • Inextlive
  • मेरी खबरें
मेरी खबरें
  • होम
  • ताजा खबरें
  • मध्यप्रदेश
  • छत्तीसगढ़
  • उत्तर प्रदेश
  • देश
  • धर्म
  • मनोरंजन
  • राशिफल
  • लाइफस्टाइल
  • अन्य
    • बिज़नेस
    • बड़ी खबरें
    • खेल
    • विदेश
    • करियर
    • टॉपिक्स
    • टेक्नोलॉजी
    • शिक्षा
  • राज्य चुनें
  • ई-पेपर
  • राशिफल
  • राज्य चुनें
  • ई-पेपर
  • फटाफट
  • राशिफल
  • वेब स्टोरीज
नईदुनिया ट्रेंडिंग
  • बढ़ता यूपी
  • समृद्ध उत्तराखंड
  • गणेशोत्‍सव 2026
  • हनुमान अंश
  • मध्‍य प्रदेश की खबरें
  • राशि परिवर्तन
  • मानसून
  • वास्‍तु शास्‍त्र
  • स्वच्छ जल
  • होम
  • मध्य प्रदेश
  • जबलपुर

यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Dec 03, 2020 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

Jabalpur News: गीतांजलि के सर्वोत्कृष्ट अनुगायक जबलपुर के भवानी प्रसाद तिवारी

पंडित भवानी प्रसाद तिवारी ने गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की नोबल पुरस्कृत कृति 'गीतांजलि' का सर्वोत्कृष्ट अनुगायन किया था।

By Ravindra SuhaneEdited By: Ravindra Suhane
Publish Date: Thu, 03 Dec 2020 12:31:23 PM (IST)Updated Date: Thu, 03 Dec 2020 12:31:23 PM (IST)
Jabalpur News: गीतांजलि के सर्वोत्कृष्ट अनुगायक जबलपुर के भवानी प्रसाद तिवारी

सुरेंद्र दुबे, जबलपुर। एक-दो नहीं पूरे सात बार जबलपुर के प्रथम नागरिक अर्थात महापौर निर्वाचित हुये पंडित भवानी प्रसाद तिवारी ने गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की नोबल पुरस्कृत कृति 'गीतांजलि' का सर्वोत्कृष्ट अनुगायन किया था। उन्होंने 1942 में भारत छोडो आंदोलन के दौरान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के रूप में जेल में बंद रहते हुए हरि विष्णु कामथ की प्रेरणा से यह प्रशंसनीय सृजन किया था। इसका प्रकाशन होने पर स्वयं टैगोर के अलावा अनेक समकालीन रचनाकारों ने इस कृति की मुक्तकंठ से सराहना की थी। इसी के साथ जबलपुर के श्री तिवारी की ख्याति देशभर में फैल गई। खास बात यह कि 'सौंदर्य की नदी नर्मदा' के रचयिता जबलपुर निवासी अमृतलाल वेगड सहित जबलपुर के कुछ अन्य नामवर कलाकार गुरुदेव के शांतिनिकेतन के विद्यार्थी रहे। पंडित भवानी प्रसाद तिवारी की पुत्रवधू अनामिका तिवारी के अनुसार मेरे बाबूजी ने टैगोर की अंग्रेजी गीतांजलि से भाव ग्रहण करके हिंदी गीतांजलि की रचना की थी। इसीलिये उसे महज अनुवाद के स्थान पर अनुगायन की कोटि में समादृत किया गया।

गीत जब जैसा उठा, वैसा अंकित किया गया : स्वयं भवानी प्रसाद तिवारी ने अपनी कृति के प्रारंभ में स्पष्ट किया है कि मैं सर्वप्रथम गीतांजलि के भाव से जुड़ा, इसके बाद गीत जब जैसा उठा, वैसा अंकित किया गया। बहरहाल, मैं सहजता से गीत गा सकने के हुनर में कहां तक सफल रहा, वर्तमान और भविष्य के गीत पारखी बखूबी यह निर्धारित कर सकेंगे।


गीतांजलि के अनुरूप अनुक्रम और भावगत समानता : सबसे खास बात यह है कि जबलपुर के श्री तिवारी की समूची कृति में गुरुदेव की मूल गीतांजलि के अनुरूप भरपूर अनुक्रम भी है और भावगत समानता भी। यह साहित्यिक समझ की दृष्टि से अपने आप में किसी कमाल से कम नहीं। जब यह रचना गुरुदेव के समक्ष पहुंची, तो उन्होंने इसे अपनी गीतांजलि का अनुवाद मात्र न मानकर सर्वथा मौलिक कृति निरूपित करते हुये हौसला बढ़ाया।

प्रत्येक पृष्ठ में गुरुदेव का रेखाचित्र, उसके ऊपर गीत : भारत प्रकाशन, सुषमा साहित्य मंदिर के अलावा एक अन्य प्रकाशन से यह कृति तीन संस्करणों में समय-समय पर सामने आई। इसके प्रत्येक पृष्ठ पर गुरुदेव का रेखाचित्र अंकित था, जिसके साथ एक-एक गीत की प्रस्तुति दी गई। इस तरह सुधिपाठकों के बीच यह कृति बेहद लोकप्रिय हुई। इसने संस्कारधानी जबलपुर और गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के बीच रचनात्मक संबंध की डोर को मजबूत किया था। जबलपुर के व्याकरणिक कामता प्रसाद गुरु की तरह भवानी तिवारी भी राष्ट्र के गौरव हो गए थे।