
नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। मध्य प्रदेश में ओबीसी आरक्षण को 14 से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने का मामला केवल आरक्षण के प्रतिशत तक सीमित नहीं रहा। कानूनी लड़ाई में संवैधानिक सीमा, सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन, सरकारी सेवाओं में प्रतिनिधित्व, आंकड़ों की विश्वसनीयता और राज्य सरकार के नीतिगत अधिकार जैसे सवालों पर बहस हुई। हाई कोर्ट के 159 पृष्ठीय आदेश में इन पहलुओं पर विचार करते हुए 27 प्रतिशत आरक्षण की मांग को अस्वीकार कर दिया गया।
ओबीसी आरक्षण बढ़ाने के फैसले को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ताओं का प्रमुख तर्क था कि ओबीसी आरक्षण 27 प्रतिशत करने से एससी, एसटी और ओबीसी के लिए निर्धारित आरक्षण का कुल प्रतिशत 63 हो जाता है। ईडब्ल्यूएस के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण को भी शामिल करने पर कुल आरक्षण का आंकड़ा और बढ़ता है। उनके अनुसार, यह सुप्रीम को द्वारा निर्धारित सामान्य 50 प्रतिशत सीमा के विपरीत है।
याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के इंद्रा साहनी प्रकरण का हवाला देते हुए कहा कि 50 प्रतिशत की सीमा से अधिक आरक्षण के लिए असाधारण परिस्थितियों का होना आवश्यक है। केवल किसी वर्ग की जनसंख्या या उसके अनुपात में आरक्षण बढ़ाने की मांग पर्याप्त नहीं हो सकती। राज्य सरकार को यह साबित करना चाहिए कि आरक्षण बढ़ाने के लिए संवैधानिक रूप से स्वीकार्य और ठोस आधार मौजूद हैं।
राज्य सरकार की ओर से आरक्षण बढ़ाने के फैसले का बचाव करते हुए सामाजिक न्याय और पिछड़े वर्गों के प्रतिनिधित्व की आवश्यकता पर जोर दिया गया। सरकार का पक्ष था कि ओबीसी वर्ग की सामाजिक स्थिति और सरकारी सेवाओं में उसकी भागीदारी को ध्यान में रखकर आरक्षण का प्रतिशत निर्धारित किया गया है। राज्य की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि आरक्षण की सीमा से संबंधित संवैधानिक सिद्धांतों का परीक्षण मामले के तथ्यों और उपलब्ध सामग्री के आधार पर किया जाना चाहिए।
ईडब्ल्यूएस आरक्षण को लेकर भी अलग संवैधानिक आधार का तर्क सामने आया। राज्य की ओर से कहा गया कि ईडब्ल्यूएस आरक्षण संविधान के अनुच्छेद 15(6) और 16(6) के तहत दिया गया है, इसलिए उसका परीक्षण ओबीसी के आरक्षण के समान आधार पर नहीं किया जा सकता। वर्ष 2021 में हाई कोर्ट के समक्ष हुई सुनवाई में राज्य के महाधिवक्ता ने यह पक्ष रखा था।
27 प्रतिशत आरक्षण के समर्थन में पक्षकारों ने कहा कि ओबीसी वर्ग की सामाजिक और शैक्षणिक स्थिति व सरकारी सेवाओं में उसकी भागीदारी को ध्यान में रखे बिना आरक्षण का प्रतिशत निर्धारित नहीं किया जा सकता। उनका जोर इस बात पर था कि पिछड़े वर्गों को पर्याप्त अवसर और प्रतिनिधित्व उपलब्ध कराने के लिए राज्य सरकार को नीतिगत निर्णय लेने का अधिकार है।
आरक्षण समर्थकों की दलील का मूल आधार यह था कि सामाजिक न्याय की संवैधानिक व्यवस्था का उद्देश्य केवल औपचारिक समानता नहीं, बल्कि ऐतिहासिक रूप से पिछड़े वर्गों को अवसर उपलब्ध कराना भी है। इस दृष्टिकोण से 27 प्रतिशत आरक्षण को लागू करने की मांग की गई।
मामले में यह महत्वपूर्ण प्रश्न भी उठा कि आरक्षण बढ़ाने के निर्णय के पीछे कौन से आंकड़े थे और वे कितने विश्वसनीय थे। वर्ष 2019 के निर्णय में 1983 की महाजन आयोग रिपोर्ट पर निर्भरता को हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण पहलू माना। लगभग चार दशक पुरानी रिपोर्ट के आधार पर आरक्षण बढ़ाने के निर्णय की पर्याप्तता पर सवाल उठा।
राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग से परामर्श नहीं किए जाने का मुद्दा भी आदेश में आया। इसके अतिरिक्त, बाद में प्रस्तुत विस्तृत रिपोर्ट का भी परीक्षण किया गया। हाई कोर्ट ने उसके सीमित नमूने और तुलनात्मक आधार के अभाव को देखते हुए उसे आरक्षण 27 प्रतिशत करने के लिए पर्याप्त ठोस आधार नहीं माना।
हाई कोर्ट ने कहा कि ओबीसी को आरक्षण देने के अधिकार और आरक्षण की सीमा बढ़ाने के औचित्य को अलग-अलग प्रश्नों के रूप में देखा जाना चाहिए। हाई कोर्ट ने उपलब्ध सामग्री के आधार पर लोक सेवाओं में ओबीसी वर्ग का प्रतिनिधित्व पर्याप्त माना और 27 प्रतिशत आरक्षण के लिए आवश्यक असाधारण परिस्थितियां स्थापित नहीं पाईं।
फैसले में एक ओर 14 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था कायम रखी गई, तो दूसरी ओर पहले से नियुक्त कुछ अभ्यर्थियों को राहत भी दी गई। निर्धारित अवधि में 14 प्रतिशत से अधिक आरक्षण के आधार पर नियुक्त ओबीसी अभ्यर्थियों की नियुक्तियां सुरक्षित रखी गईं। वहीं, रोके गए 13 प्रतिशत पदों पर अनारक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को तीन महीने में नियुक्त करने के निर्देश दिए गए। इस प्रकार हाई कोर्ट के सामने सामाजिक न्याय और संवैधानिक सीमा के बीच संतुलन का प्रश्न था। निर्णय में इसका ध्यान रखा गया।