
नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। डॉक्टर बनने का सपना देखने वाले ग्रामीणों और हिंदी माध्यम के छात्रों के लिए अंग्रेजी आज भी सबसे बड़ी दीवार है। इसी दीवार को तोड़ने के लिए मध्य प्रदेश ने देश में सबसे पहले प्रयोग शुरू किया और अब जबलपुर से देश के पहले पूर्ण हिंदी माध्यम मेडिकल कॉलेज का प्रस्ताव सामने आया है।
तैयारी के नाम पर सबसे बड़ा काम किताबों का हुआ है। चिकित्सा विश्वविद्यालय का दावा है कि एमबीबीएस की सभी प्रमुख किताबें हिंदी में अनुवादित हो चुकी हैं। भविष्य में बीडीएस व अन्य भी हिंदी में लाने की योजना है, लेकिन जमीनी हकीकत अलग है।
एक रिपोर्ट के अनुसार, सरकार ने हिंदी किताबों की छपाई पर 10 करोड़ रुपये खर्च किए, फिर भी अब तक एक भी छात्र ने एमबीबीएस का पर्चा हिंदी में नहीं दिया। छात्रों का कहना है कि नीट, पीजी और विदेशी जर्नल सब अंग्रेजी में हैं। हिंदी में पढ़ने के बाद प्रतियोगी परीक्षा में पिछड़ने का डर है।
सबसे बड़ी चुनौती ये है कि हिंदी में पढ़ाने वाले डॉक्टर कहां से आएंगे। प्रस्ताव के अनुसार, 2027-28 सत्र से जबलपुर में 50 एमबीबीएस सीटों के साथ कॉलेज शुरू होगा, जहां क्लास से लेकर लैब, वार्ड और परीक्षा तक सब कुछ हिंदी में होगा। प्रदेश के मेडिकल कॉलेजों में ही 30-40 प्रतिशत फैकल्टी के पद खाली हैं।
ऐसे में हिंदी में मेडिकल की पढ़ाई हो सके, ऐसे प्रशिक्षित शिक्षक मिलना मुश्किल है। मेडिकल टर्मिनोलाजी को हिंदी में समझाना और फिर उसी पर सर्जरी सिखाना आसान नहीं।
यह प्रस्ताव मध्य प्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय, जबलपुर की कार्यपरिषद में पारित हो चुका है। वर्तमान प्रगति तीन चरणों में है। विश्वविद्यालय स्तर पर कार्यपरिषद से सैद्धांतिक मंजूरी मिल चुकी है और एक करोड़ का प्रारंभिक बजट भी प्रस्तावित किया गया है। अब राज्य सरकार स्तर पर डीपीआर तैयार होना है।
विश्वविद्यालय इसका विस्तृत परियोजना प्रतिवेदन बनाकर राज्य शासन को भेजेगा। जमीन चिह्नित करने की बात भी कही जा रही है। शासन की मंजूरी के बाद प्रस्ताव राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) को जाएगा। एनएमसी के सभी मानकों पर खरा उतरने के बाद ही मान्यता मिलेगी। कॉलेज को पूरी तरह आवासीय और कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस के रूप में विकसित करने की योजना है।
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