
नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। स्मार्ट मीटर से बिजली चोरी और वितरण हानि रोकने के लिए हजारों करोड़ रुपये खर्च किए गए, लेकिन करीब चार साल बाद भी यदि बिजली हानि का लक्ष्य घटने के बजाय 24.5 प्रतिशत तक बढ़ाने का प्रस्ताव सामने आता है तो सवाल उठना स्वाभाविक है? इसी मुद्दे को लेकर मध्य प्रदेश पावर मैनेजमेंट कंपनी और बिजली वितरण व्यवस्था पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं।
सेवानिवृत्त अतिरिक्त मुख्य अभियंता एवं एडवोकेट राजेंद्र अग्रवाल ने आरोप लगाया है कि दिसंबर 2022 में मध्य प्रदेश विद्युत नियामक आयोग द्वारा करीब 1.30 करोड़ स्मार्ट मीटर और विद्युत वितरण नेटवर्क के विकास के लिए 26 हजार करोड़ रुपये की स्वीकृति दी गई थी।
योजना का प्रमुख उद्देश्य बिजली चोरी और तकनीकी-वाणिज्यिक हानि को कम करते हुए इसे करीब 12 प्रतिशत तक लाना था। ऐसे में अब अप्रैल 2027 से हानि का स्तर 24.5 प्रतिशत निर्धारित करने का प्रस्ताव, योजना की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े करता है।
राजेंद्र अग्रवाल का कहना है कि यदि स्मार्ट मीटर और वितरण नेटवर्क के आधुनिकीकरण पर 26 हजार करोड़ रुपये का निवेश किया गया है तो करीब चार साल बाद बिजली हानि का स्तर कम होने के बजाय इतना अधिक निर्धारित करने की जरूरत क्यों पड़ रही है।
उनका आरोप है कि बिजली कंपनियां अपनी अक्षमता, लापरवाही और कथित अनियमितताओं की जिम्मेदारी से बचने के लिए उद्योगों को निशाना बनाने का प्रयास कर रही हैं। बड़े निवेश के बिजली चोरी व हानि के आंकड़ों में कितना सुधार हुआ? कितने स्मार्ट मीटर लगाए गए, उनसे कितनी बिजली चोरी पकड़ी गई और वितरण हानि में कितनी कमी आई?
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