
नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। हाई कोर्ट ने बहकावे में आकर एक कर्मचारी के खिलाफ दर्ज कराई गई दुष्कर्म और अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत अपराध की रिपोर्ट सहित उससे जुड़ी सभी आपराधिक कार्यवाहियां निरस्त कर दी हैं।
न्यायमूर्ति हिमांशु जोशी की एकलपीठ ने कहा कि आपराधिक कानून और वास्तविक पीड़ितों के हित में बनाए गए लाभकारी प्रविधानों के दुरुपयोग को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि शिकायतकर्ता महिला इस मामले में पीड़ित प्रतिकर योजना के तहत किसी मुआवजे की हकदार नहीं होगी।
यदि उसे पहले कोई प्रतिकर राशि दी जा चुकी है तो उसकी वसूली की जाए। मामला सिंगरौली जिले के लोक निर्माण विभाग में समयपाल के पद पर पदस्थ संतोष सिंह से जुड़ा है। उनके खिलाफ एक महिला ने गढ़वा थाने में चार जनवरी, 2013 को दुष्कर्म और अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत अपराध दर्ज कराया था।
संतोष सिंह ने इसके विरुद्ध वर्ष 2016 में हाई कोर्ट में पुनरीक्षण याचिका दायर की थी। सुनवाई के दौरान 11 अगस्त को दोनों पक्षों ने समझौते का आवेदन प्रस्तुत किया। हाई कोर्ट ने समझौते की वास्तविकता का सत्यापन कराने के लिए मामला रजिस्ट्रार के समक्ष भेजा।
सत्यापन के दौरान शिकायतकर्ता महिला ने स्वीकार किया कि उसने प्रदीप सिंह के कहने पर संतोष सिंह के खिलाफ झूठी रिपोर्ट दर्ज कराई थी। महिला की स्वीकारोक्ति और उपलब्ध तथ्यों को देखते हुए हाई कोर्ट ने प्राथमिकी तथा उससे संबंधित पूरी आपराधिक कार्यवाही निरस्त कर दी।
कोर्ट ने कहा कि किसी निर्दोष व्यक्ति को फंसाने के लिए कानून और वास्तविक पीड़ितों की सहायता के लिए बनाई गई योजनाओं का गलत इस्तेमाल न्याय व्यवस्था के उद्देश्य को प्रभावित करता है।
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