रजनीश बाजपेई, जबलपुर। भौगोलिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण मध्य प्रदेश के कटनी जिले के ढीमरखेड़ा तहसील के करौंदी गांव के हाल बदहाल हैं। करीब 200 की आबादी वाले गांव को भारत का भौगोलिक केंद्र बिंदु माना जाता है। विश्व के 18 देशों और भारत के आठ राज्यों से गुजरने वाली कर्क रेखा इस गांव से गुजरती है। विंध्याचल पर्वत श्र्खला की पहाड़ियों के ढलान में बसे इस गांव को इसी खासियत की वजह से देश का दिल (हार्ट ऑफ कंट्री) भी कहते हैं। इसे गांव को आदर्श बनाने का सपना दशकों पहले देखा गया लेकिन आज भी यह साधारण सा गांव है।

विकास के नाम पर सजावटी पत्थर जरूर दिखते हैं लेकिन वे भी समय के साथ उपेक्षित हैं। इसे सात साल पहले टूरिस्ट मेगा सर्किट में शामिल किया था। इस दौरान लाखों रुपये खर्च हो गए लेकिन कुछ पत्थर लगाने के सिवा कुछ खास नहीं हो पाया।

इंजीनियरिंग कॉलेज जबलपुर के संस्थापक प्राचार्य एसपी चक्रवर्ती की अगुवाई में 1956 में इस स्थान की खोज के बाद इसे भौगोलिक रूप से देश के केंद्र बिंदु के रूप में मान्यता मिली। दिसंबर 1987 में तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. चंद्रशेखर करौंदी पहुंचे और उसी साल यहां एक स्मारक बनना शुरू हुआ।

15 दिसंबर 1987 को स्मारक बनकर तैयार हुआ। स्व. चंद्रशेखर फिर यहां आए और उन्होंने यहां अंतरराष्ट्रीय कृषि नगर बनाने की घोषणा की। यहां उन्होंने आधा एकड़ में आश्रम भी बनाया लेकिन अब यह भी बदहाल है। इसका प्रबंधन भारत यात्रा केंद्र ट्रस्ट देखता है। यह घोषणा आज तक मूर्त रूप नहीं ले सकी है। अंतराष्ट्रीय आदर्श गांव बनाने की योजना उपयुक्त जमीन नहीं मिल पाने से अधूरी रह गई।

इस जगह के महत्व को देखते हुए आध्यात्मिक गुरु महर्षि महेश योगी ने 29 नवंबर 1995 को यहां से कुछ दूरी पर महर्षि विश्वविद्यालय की स्थापना की। यहां पर विदेशों से भी वेदों का अध्ययन करने बटुक आते हैं। महर्षि महेश योगी ने यहां पर 2222 फीट ऊंचाई की 124 मंजीला इमारत बनाने की योजना बनाई थी। 2002 में इसकी आधारशिला भी रख दी गई थी लेकिन रक्षा मंत्रालय से अनुमति न मिलने और इलाके के भूकंप संवेदी होने की वजह से इसकी अनुमति नहीं मिल पाई। हालांकि विश्वविद्यालय में अभी भी अध्ययन-अध्यापन चलता है।

राशि खर्च, विकास नहीं हुआ

करौंदी गांव को टूरिस्ट मेगा सर्किट में शामिल किया गया है। इसका विकास करने 17 अगस्त 2013 को तत्कालीन क्षेत्रीय विधायक व पूर्व मंत्री मोती कश्यप ने पर्यटन विकास निगम के अधिकारियों की मौजूदगी में विकास कार्यों की आधार शिला रखी गई थी। सात वर्ष में यहां करीब 66 लाख रुपये की राशि खर्च होना बताया जा रहा है। गांव में विकास के नाम पर कहीं-कहीं सजावटी मार्बल पत्थर ही लगाए गए हैं।

वर्ष 2018 में ग्रामीण अभियांत्रिकी सेवा (आरईएस) द्वारा यहां पर विकास के लिए कलेक्टर के फंड से 61 लाख रुपये की लागत से सुंदरीकरण की योजना बनाई गई लेकिन उसका भी काम गांव में दिखाई नहीं देता। गांव के रामलाल पटेल इससे निराश हैं। वे कहते हैं कि विकास योजनाओं से पर्यटन बढ़ने की उम्मीद थी, उससे रोजगार मिलता लेकिन कुछ भी नहीं हो पाया।

इनका कहना है

'करौंदी में पर्यटन, पुरातत्व विभाग के अलावा कलेक्टर फंड से भी काम हुए। ग्रामीणों को भी जागरूक किया जा रहा है कि वे राष्ट्रीय संपत्ति की सुरक्षा करें। इस स्थान को और अधिक किस तरह विकसित किया जाए। इस पर कार्य किया जा रहा है।

एसबी सिंह, कलेक्टर, कलेक्टर

Posted By: Hemant Kumar Upadhyay

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