
नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। जिन वैधानिक सेवा नियमों में कर्मचारी की नगर निगम में प्रतिनियुक्ति या पोस्टिंग का प्रविधान है, वहां कर्मचारी की अलग से लिखित सहमति लेना आवश्यक नहीं है। ऐसी स्थिति में कर्मचारी की सहमति सेवा नियमों में ही निहित मानी जाएगी। हाई कोर्ट की युगलपीठ ने यह महत्वपूर्ण सिद्धांत प्रतिपादित करते हुए नगर निगम मुरैना में अपनी पोस्टिंग को चुनौती देने वाले अरविंद कुमार शर्मा की रिट अपील निरस्त कर दी।
न्यायमूर्ति आनंद पाठक व न्यायमूर्ति बीपी शर्मा की युगलपीठ ने पारित आदेश में कहा कि अपीलकर्ता राज्य शहरी इंजीनियरिंग सेवा का सदस्य है और उस पर मप्र राज्य शहरी इंजीनियरिंग सेवा (भर्ती एवं सेवा की शर्तें) नियम, 2015 लागू होते हैं।
नियमों की अनुसूची-1 में कार्यपालन यंत्री सहित अन्य इंजीनियरिंग अधिकारियों के नगर निगमों में प्रतिनियुक्ति के लिए पद निर्धारित हैं। ऐसी स्थिति में प्रतिनियुक्ति की संभावना संबंधित कर्मचारी की वैधानिक सेवा-शर्तों का हिस्सा है। इसलिए केवल इस आधार पर स्थानांतरण आदेश को अवैध नहीं माना जा सकता कि कर्मचारी की अलग से सहमति नहीं ली गई।
मामले के अनुसार अरविंद कुमार शर्मा की प्रारंभिक नियुक्ति नगर परिषद उमरिया में सब इंजीनियर के पद पर हुई थी। पदोन्नति के बाद वे सहायक यंत्री और प्रभारी कार्यपालन यंत्री के रूप में कार्यरत रहे। बाद में नगर परिषद शहडोल से नगर निगम मुरैना स्थानांतरण और कार्यमुक्त करने के आदेश 15 और 16 जून 2026 को जारी किए गए।
उन्होंने इसे चुनौती देते हुए कहा था कि नगर परिषद के कर्मचारी को दूसरे प्रतिष्ठान यानी नगर निगम में भेजना वस्तुतः प्रतिनियुक्ति है और इसके लिए उनकी सहमति आवश्यक थी। एकल पीठ ने 13 जुलाई 2026 को उनकी याचिका निरस्त कर दी थी, जिसके विरुद्ध यह रिट अपील दायर की गई थी।
राज्य शासन की ओर से उप महाधिवक्ता स्वप्निल गांगुली ने पक्ष रखते हुए तर्क दिया कि अपीलकर्ता इंजीनियरिंग कैडर का सदस्य है और 2015 के नियमों के तहत कार्यपालन यंत्री तथा अन्य इंजीनियरिंग अधिकारियों के पद नगर निगमों में प्रतिनियुक्ति के लिए निर्धारित हैं। इसलिए अलग से सहमति की आवश्यकता नहीं है।
हाई कोर्ट ने अरुण कुमार मेहता बनाम राज्य शासन के फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि जब अधिकारी को 2015 के नियमों के तहत पदोन्नति मिलती है तो उसे यह जानकारी रहती है कि उसकी पोस्टिंग प्रतिनियुक्ति पर हो सकती है। नियमों में अलग से सहमति का प्रावधान नहीं है, इसलिए सहमति निहित मानी जाएगी।
युगलपीठ ने स्टेट ऑफ पंजाब बनाम इंदर सिंह और कवि राज बनाम स्टेट आफ यूपी के सिद्धांतों का भी उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि प्रतिनियुक्ति के सामान्य सिद्धांतों को संबंधित कर्मचारी पर लागू वैधानिक सेवा नियमों के संदर्भ में देखा जाना होगा। जहां सेवा नियम स्वयं ऐसी पोस्टिंग की व्यवस्था करते हैं, वहां सहमति लिखित रूप में व्यक्त होना अनिवार्य नहीं है।
हाई कोर्ट ने पाया कि अपीलकर्ता यह प्रदर्शित नहीं कर सका कि एकल पीठ ने किसी वैधानिक प्रविधान या बाध्यकारी न्याय दृष्टांत की अनदेखी की है। इसलिए 13 जुलाई 2026 के एकलपीठ के आदेश में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं है। एकल पीठ द्वारा अपीलकर्ता की ओर से प्रस्तुत अभ्यावेदन पर 30 दिन में विचार करने का निर्देश भी बरकरार रखा गया। इसके साथ ही रिट अपील निरस्त कर दी गई।