
नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि किसी महिला को केवल विवाहित बेटी होने के आधार पर अनुकंपा नियुक्ति के विचार से बाहर नहीं किया जा सकता।
न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह की एकलपीठ ने बालाघाट निवासी दीप्ति बिसेन की याचिका पर सुनवाई करते हुए उनके अनुकंपा नियुक्ति के दावे को खारिज करने वाले दोनों आदेश निरस्त कर दिए।
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता सुमित्रा तिवारी ने पक्ष रखा, जबकि शासन की ओर से उप महाधिवक्ता श्वेता यादव ने पैरवी की। याचिकाकर्ता के पिता बालाघाट जिले के शासकीय प्राथमिक स्कूल पुनी में सहायक शिक्षक थे। 16 जून, 2013 को सेवा के दौरान उनका निधन हो गया था।
पिता के निधन के बाद उनके पुत्र मनीष भगत ने अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया, लेकिन आवेदन लंबित रहने के दौरान दुर्घटना में 75 प्रतिशत मानसिक दिव्यांगता के कारण वे नौकरी के लिए चिकित्सकीय रूप से अयोग्य हो गए।
पुत्र और विधवा ने दीप्ति के नाम पर नियुक्ति के लिए आवेदन किया। विभाग ने 2014 की नीति का हवाला देकर कहा था कि विवाहित बेटी को अनुकंपा नियुक्ति तभी मिल सकती है, जब मृत कर्मचारी का पुत्र न हो।
हाई कोर्ट ने कहा कि इस आधार पर दावा निरस्त करना कानूनन टिकाऊ नहीं है। कोर्ट ने मीनााक्षी दुबे मामले में फुल बेंच के निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि विवाहित बेटी को अनुकंपा नियुक्ति के दायरे से बाहर करना असंवैधानिक है।
दोनों पुराने आदेश निरस्त कर सक्षम प्राधिकारी को 60 दिन में मामले पर नए सिरे से विचार कर कारणयुक्त आदेश पारित करने के निर्देश दिए।