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हाई कोर्ट ने कहा कि सर्कुलर की आड़ में शिक्षकों का हक नहीं छीन सकती सरकार

यदि कर्मचारी मूल नियमों के तहत एक समान श्रेणी में आते हैं तो उनके बीच भेदभाव के लिए उचित, तार्किक और उद्देश्यपूर्ण आधार होना आवश्यक है।

By Surendra DubeyEdited By: Dheeraj kumar Bajpai
Publish Date: Fri, 28 Aug 2026 04:39:14 PM (IST)Updated Date: Fri, 28 Aug 2026 04:39:14 PM (IST)
हाई कोर्ट ने कहा कि सर्कुलर की आड़ में शिक्षकों का हक नहीं छीन सकती सरकार
काई कोर्ट का कहना है कि कुछ शिक्षकों को लाभ देना और कुछ को उससे वंचित करना उचित नहीं है।

HighLights

  1. स्कूल शिक्षा विभाग की पुनर्विचार याचिका खारिज की
  2. दो अग्रिम वेतनवृद्धि देने का आदेश बरकरार
  3. कोर्ट ने पुनर्विचार का कोई ठोस आधार नहीं पाया

नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। हाई कोर्ट ने शिक्षकों को बीएड-डीएड की योग्यता हासिल करने पर मिलने वाली दो अग्रिम वेतनवृद्धि के मामले में राज्य सरकार को झटका दिया है।

अलग-अलग वर्ग नहीं बनाया जा सकता

न्यायमूर्ति विवेक जैन की एकलपीठ ने स्कूल शिक्षा विभाग की पुनर्विचार याचिका खारिज करते हुए कहा कि एक ही वर्ग के कर्मचारियों के बीच बिना ठोस आधार और तार्किक उद्देश्य के मनमाने तरीके से कट-आफ तारीख तय कर अलग-अलग वर्ग नहीं बनाया जा सकता।

दोनों शिक्षकों ने बीएड-डीएड की योग्यता हासिल की थी

सरकार महज परिपत्र जारी कर मूल नियमों के तहत समान रूप से पात्र कर्मचारियों को उनके वैधानिक लाभ से वंचित नहीं कर सकती। मामला पन्ना जिले के शिक्षक सुमेर सिंह और भान सिंह से संबंधित है। दोनों शिक्षकों ने बीएड-डीएड की योग्यता हासिल की थी।


चुनौती देते हुए पुनर्विचार याचिका दायर की थी

हाई कोर्ट ने 16 जून 2025 को दोनों को संबंधित योग्यता पूरी करने पर दो अग्रिम वेतनवृद्धि देने का आदेश दिया था। राज्य सरकार ने इस आदेश को चुनौती देते हुए पुनर्विचार याचिका दायर की थी। सरकार की ओर से दलील दी गई कि दोनों शिक्षकों ने आवश्यक शैक्षणिक योग्यता एक मार्च 1999 के बाद हासिल की थी। इसलिए वे दो अग्रिम वेतनवृद्धि के पात्र नहीं हैं।

लागू मूल नियमों और बाद में जारी परिपत्र की जांच की

सरकार ने इसी आधार पर पूर्व आदेश पर पुनर्विचार की मांग की। हाई कोर्ट ने मामले में लागू मूल नियमों और बाद में जारी परिपत्र की जांच की। सामने आया कि मूल नियमों के अनुसार 16 जून 1993 से पहले नियुक्त शिक्षकों को इस लाभ का पात्र माना गया था। 16 जून 1993 के बाद संबंधित शैक्षणिक योग्यता को शिक्षक भर्ती के लिए अनिवार्य कर दिया गया था।

16 जून 1993 से पहले नियुक्त शिक्षक तभी अग्रिम वेतनवृद्धि के पात्र होंगे

इसके बाद सरकार ने एक परिपत्र जारी कर अतिरिक्त शर्त जोड़ दी कि 16 जून 1993 से पहले नियुक्त शिक्षक तभी अग्रिम वेतनवृद्धि के पात्र होंगे, जब उन्होंने बीएड-डीएड की योग्यता 1 मार्च 1999 से पहले हासिल की हो। न्यायमूर्ति विवेक जैन ने कहा कि 16 जून 1993 से पहले नियुक्त सभी शिक्षक एक ही वर्ग में आते हैं। ऐसे में इस वर्ग के भीतर बिना उचित आधार, तर्क और उद्देश्य के अलग-अलग उपवर्ग बनाकर कुछ शिक्षकों को लाभ देना और कुछ को उससे वंचित करना उचित नहीं है।

ध अधिकार को समाप्त करने का आधार नहीं

कोर्ट ने माना कि बाद में जोड़ी गई एक मार्च 1999 की कट-आफ तारीख के आधार पर शिक्षकों के बीच किया गया भेद तार्किक और उचित आधार पर आधारित नहीं है। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रशासनिक परिपत्र या मनमाना वर्गीकरण किसी कर्मचारी के वैध अधिकार को समाप्त करने का आधार नहीं बन सकता।

कोर्ट ने पुनर्विचार का कोई ठोस आधार नहीं पाया

यदि कर्मचारी मूल नियमों के तहत एक समान श्रेणी में आते हैं तो उनके बीच भेदभाव के लिए उचित, तार्किक और उद्देश्यपूर्ण आधार होना आवश्यक है। कोर्ट ने पुनर्विचार का कोई ठोस आधार नहीं पाया। इसके बाद राज्य सरकार की पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी गई और 16 जून 2025 के मूल आदेश को बरकरार रखा गया। शिक्षकों की ओर से अधिवक्ता सुभाष कुमार चतुर्वेदी ने पक्ष रखा।

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