
नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर । किसी आपराधिक मामले में सांसद या विधायक अकेला आरोपी हो, तो मुकदमा वापसी का लाभ उसी तक सीमित रहेगा या उसके साथ आरोपी अन्य लोगों को भी मिलेगा।
इसी तरह, राज्य सरकार यदि जनप्रतिनिधियों के खिलाफ लंबित आपराधिक मुकदमा वापस लेना चाहे, तो इस पर अंतिम निर्णय संबंधित विशेष अदालत करेगी या हाई कोर्ट की अनुमति आवश्यक होगी।
हाई कोर्ट में सांसदों-विधायकों से जुड़े आपराधिक मामलों की निगरानी के दौरान ये अहम कानूनी सवाल सामने आए हैं। मुख्य न्यायाधीश अल्पेश यशवंत कोगजे व न्यायमूर्ति विवेक जैन की युगलपीठ ने इन प्रश्नों पर विचार के लिए अगली सुनवाई चार नवंबर को निर्धारित की है।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता ब्रह्मदत्त सिंह ने पिछली स्टेटस रिपोर्ट के आधार पर बताया कि प्रदेश में सांसदों और विधायकों से संबंधित 19 आपराधिक मामले लंबित थे। इनमें से तीन का निराकरण विशेष अदालतों ने कर दिया, जबकि एक मामला हाई कोर्ट से निरस्त हो चुका है।
इस तरह पिछली रिपोर्ट के अनुसार 15 मामले लंबित हैं। युगलपीठ ने राज्य सरकार को लंबित प्रकरणों की अद्यतन स्थिति प्रस्तुत करने के निर्देश दिए, ताकि मौजूदा स्थिति के आधार पर आगे विचार किया जा सके।
सुनवाई के दौरान दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 321 के तहत अभियोजन वापस लेने की प्रक्रिया से जुड़े अधिकार क्षेत्र का सवाल प्रमुखता से उठा। इस प्रविधान के तहत लोक अभियोजक या सहायक लोक अभियोजक न्यायालय की सहमति से अभियोजन वापस लेने की मांग कर सकता है।
अब हाईकोर्ट यह विचार करेगा कि सांसदों-विधायकों से संबंधित मामलों में मुकदमा वापसी की प्रक्रिया के दौरान विशेष अदालत और हाईकोर्ट के अधिकारों की सीमा किस तरह निर्धारित होगी।
युगलपीठ के समक्ष एक और महत्वपूर्ण प्रश्न आया। यदि किसी मामले में पांच आरोपी हैं और उनमें से एक सांसद या विधायक है, तो सरकार उस जनप्रतिनिधि के खिलाफ अभियोजन वापस लेना चाहे, तो क्या इसका लाभ केवल उसे मिलेगा या अन्य चार आरोपियों को भी मिल सकता है।
हस्तक्षेपकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मनीष दत्त ने दलील दी कि मुकदमा वापसी का लाभ सभी पांच आरोपियों को मिल सकता है। हालांकि, इस प्रश्न पर अंतिम कानूनी स्थिति मामले के तथ्यों और लागू कानून के आधार पर ही स्पष्ट होगी। सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता संजय के. अग्रवाल व अधिवक्ता अहादुल्ला उस्मानी और रविशंकर पटेल ने भी पक्ष रखा।
हाईकोर्ट में अब चार नवंबर को सुनवाई होगी। राज्य सरकार की ओर से लंबित मामलों की अद्यतन स्थिति प्रस्तुत किए जाने के साथ मुकदमा वापसी की प्रक्रिया और संबंधित अदालतों के अधिकार क्षेत्र से जुड़े प्रश्नों पर विचार किया जाएगा। इस मामले में होने वाली सुनवाई से जनप्रतिनिधियों के खिलाफ लंबित आपराधिक मुकदमों की वापसी से संबंधित कानूनी स्थिति पर महत्वपूर्ण स्पष्टता आने की उम्मीद है।
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