
नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। हाई कोर्ट ने सरकारी कर्मचारियों की पदोन्नति में आरक्षण को लेकर दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए महत्वपूर्ण अंतरिम आदेश जारी किया है।
न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल व न्यायमूर्ति विनय सराफ की युगलपीठ ने स्पष्ट किया है कि प्रदेश के किसी भी शासकीय विभाग में पदोन्नति के दौरान आरक्षण की 50 प्रतिशत की निर्धारित सीमा का उल्लंघन नहीं होना चाहिए। इस व्यवस्था का कड़ाई से पालन सुनिश्चित कराने और इसकी निगरानी की जिम्मेदारी सीधे राज्य के मुख्य सचिव को सौंपी गई है।
हाई कोर्ट ने अपने अंतरिम आदेश में इंदिरा साहनी मामले में प्रतिपादित सिद्धांतों का हवाला देते हुए कहा कि आरक्षण की अधिकतम 50 प्रतिशत सीमा को प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से पार नहीं किया जा सकता।
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि पदोन्नति के लिए विचार किए जाने का अधिकार कर्मचारी का अधिकार है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि प्रत्येक कर्मचारी को पदोन्नति मिलना अनिवार्य हो। पदोन्नति के लिए विचार का अवसर निर्धारित नियमों और कानूनी प्रावधानों के अनुरूप ही दिया जाना चाहिए।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मनोज शर्मा ने तर्क दिया कि राज्य सरकार विभिन्न विभागों में लगातार पदोन्नतियां कर रही है। एक बार पदोन्नति हो जाने के बाद कर्मचारियों को मूल पद पर वापस भेजना अत्यंत कठिन हो जाता है, जिससे याचिकाकर्ताओं के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि पूर्व में हुई पदोन्नतियों के मामलों में कानून और न्यायालयीन व्यवस्थाओं के बावजूद किसी कर्मचारी को मूल पद पर वापस नहीं भेजा गया है। इस संबंध में 2016 के आरबी राय मामले का भी उल्लेख किया गया।
वहीं, राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता प्रशांत सिंह ने सुप्रीम कोर्ट के जरनैल सिंह एवं अन्य बनाम लक्ष्मी नारायण गुप्ता प्रकरण में 20 अगस्त 2026 को पारित आदेश का हवाला दिया। बताया गया कि शीर्ष अदालत ने संबंधित अपीलों को तीन माह के भीतर उचित पीठ के समक्ष सूचीबद्ध करने के निर्देश दिए हैं। सुनवाई के दौरान सामान्य वर्ग की ओर से यह भी आपत्ति उठाई गई कि कई विभागों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व होने और मेरिट के आधार पर चयनित कर्मचारियों की उपलब्धता के बावजूद आरक्षण का लाभ दिया जा रहा है।
फिलहाल, वर्ष 2025 के पदोन्नति नियमों और 50 प्रतिशत सीमा से जुड़े विवाद पर हाई कोर्ट का अंतिम निर्णय आना बाकी है। मामले की अगली सुनवाई एक दिसंबर को निर्धारित की गई है। तब तक मुख्य सचिव की निगरानी में हाई कोर्ट की यह अंतरिम व्यवस्था प्रभावी रहेगी।
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