
नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। जबलपुर जिले में पचास से अधिक ऐसे लोग भी हैं जो जल जनित रोग से पीड़ित होकर विभिन्न सरकारी निजी अस्पताल पहुंच रहे हैं। बारिश के चार माह में यह संख्या सर्वाधिक होती है। औसतन 15 से 20 मरीज विभिन्न स्वास्थ्य केंद्र स्वास्थ्य लाभ को पहुंच रहे हैं। इधर संभाग का सबसे बड़ा चिकित्सा केंद्र नेताजी सुभाष चंद्र बोस मेडिकल कॉलेज अस्पताल, जहां न सिर्फ उल्टी दस्त बल्कि तमाम बीमारियों के मरीज बड़ी संख्या में उपचार कराने पहुंचते हैं। लेकिन स्वास्थ्य लाभ देने वाले प्रमुख सरकारी अस्पताल खुद बीमार है।
नालियों से पेयजल की पाइप गुजर रही है। वाटर कूलर बंद पड़े हैं, चारों ओर गंदगी स्वच्छता के दावे की पोल खोल रही है। इस अस्पताल में भी पेयजल की गुणवत्ता को लेकर लापरवाही हो रही है। टंकियों की समय पर सफाई नहीं होती, तथा अधिकांश वाटर प्यूरीफायर या तो खराब पड़े हैं अथवा लंबे समय से उनमें आवश्यक सुधार कार्य नहीं हो पाया है।
वहीं दूसरी ओर कायाकल्प में पूरे प्रदेश में नंबर वन का दर्जा हासिल कर चुका जिला अस्पताल विक्टोरिया की हालत भी खस्ताहाल है। पानी के पाइप लाइन में लीकेज है, नल हैं तो उसमें पानी नहीं आता। पूरा सिस्टम भूजल पर निर्भर है। अब तक अस्पताल को नर्मदा जल की आपूर्ति नहीं हो पाई है।
वार्डों के आसपास जिन पानी की टंकियों से सप्लाई पेयजल की हो रही है। उनमें से अधिकांश के ढक्कन खुले पड़े हैं।
ओटी यूनिट व डायलिसिस मरीजों के छोड़ दिया जाए तो अस्पताल में कही भी आरओ वाटर का उपयोग नहीं किया जाता है। सभी वार्ड में वाटर फिल्टर लगाने की योजना फिलहाल अधर में है।
सदर स्थित छावनी परिषद के अस्पताल में मरीजों के लिए वाटर कूलर तो लगा है लेकिन उसके आसपास गंदा पानी भरा पड़ा रहता है। इसी तरह जिला अस्पताल परिसर में जगह जगह कचरे के ढेर, पेयजल लाइन में लीकेज कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करते हैं।
दूषित पानी से हैजा, टाइफाइड, पेचिश, डायरिया, हेपेटाइटिस ए जैसे गंभीर रोग होते हैं, इससे दस्त, उल्टी, बुखार, पेट दर्द व पीलिया जैसी बीमारी कई बार जानलेवा हो जाती है।
70 साल पुराने नेताजी सुभाष चंद्र बोस मेडिकल कॉलेज अस्पताल, चिकित्सक आवास, छात्रावास को पेयजल की सप्लाई के लिए ओवरहेड टैंक उपयोग में लाया जा रहा हैं। मेडिकल कॉलेज को नगर निगम पानी की सप्लाई तेवर से करता है। अस्पताल के सभी 40 वार्डों में कहीं वाटर कूलर का उपयोग हो रहा तो कहीं सीधे टैंक से पेयजल भेजा जा रहा है। वाटर कूलर की हालत भी दयनीय है। सभी बदलने लायक स्थिति में हैं। पहले पानी की टंकी छह माह में एक बार साफ होती थी अब प्रतिमाह पीडब्ल्यूडी की टीम इनकी सफाई करेगा।
शहर के सबसे पुराने जिला अस्पताल में सबसे पहले मरीज उपचार को पहुंचते हैं, उसके बाद गंभीर स्थिति में उन्हें मेडिकल रेफर किया जाता है। लेकिन इस अस्पताल के मरीजों व चिकित्सकों को अब भी नर्मदा पेयजल लाइन का इंतजार है। अस्पताल में पुराना जलसोत्र सिस्टम है उसी से 300 बेड वाले सभी 15 वार्ड व ओपीडी को पेयजल की सप्लाई होती है। अस्पताल की टंकियों की सफाई अभी प्रति तीन माह में होती है जबकि क्लोरीन नियमित रूप से डाली जाती है।
मेडिकल कॉलेज परिसर के बाहर ठेले वाले मरीजों के स्वजन को गर्म पेयजल 10 रुपये प्रति बोतल के हिसाब से बेचते हैं। जबकि जिला अस्पताल के बाहर खड़े चाय दुकान संचालक मनोज गोखलानी निश्शुल्क पानी गर्म करते हैं और स्वजन-मरीजों को उपलब्ध कराते हैं।
हमारे पास अभी ओवरहेड टैंक हैं और तेवर से नर्मदा पेयजल की आपूर्ति होती है। पहले पानी की टंकियों को छह माह में साफ कराते थे अब हर माह क्लीन कराने के निर्देश मिले हैं। हम कोशिश कर रहे हैं कि मरीजों को स्वच्छ पेयजल मिले। - डॉ. नवनीत सक्सेना डीन एनएससीबी मेडिकल कॉलेज
हमारी पहली कोशिश है कि सबसे पहले जितनी भी पानी की लाइनें हैं उनके लीकेज ठीक कराएं जाएं, टंकियों में ढक्कन हैं अथवा नहीं यह भी देखेंगे और वाटर कूलर व प्यूरीफायर के लिए हम पत्र लिख रहे हैं। - डॉ. अरविंद शर्मा, एनएससीबी मेडिकल कॉलेज अस्पताल अधीक्षक
पेयजल की गुणवत्ता जांचने हेतु एक-एक बोतल परिसर के विभिन्न नलों से पानी लेकर पीएचई को लैब टेस्टिंग के लिए भेजा गया है। रोज क्लोरीन टैंक में मिलाई जा रही है। सफाई के लिए एक माह के शेड्यूल पर कार्य चल रहा है। हमारा प्रयास मरीजों को नर्मदा जल उपलब्ध कराना है। - डॉ. नवीन कोठारी, सिविल सर्जन जिला अस्पताल विक्टोरिया।
15 से 20 मरीज नियमित रूप से उपचार को पहुंच रहे
जलजनित रोग से पीड़ित मरीजों की संख्या हालांकि इस समय कम है। लेकिन औसतन 15 से 20 मरीज जिला अस्पताल, मेडिकल कॉलेज के अलावा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में उपचार को पहुंच रहे हैं। इनमें अधिकांश उल्टी-दस्त, पेट दर्द व पीलिया के लक्षण वाले प्रमुख हैं।
दूषित पानी से हैजा, टाइफाइड, पेचिश, डायरिया, हेपेटाइटिस ए जैसे गंभीर रोग होते हैं, इससे दस्त, उल्टी, बुखार, पेट दर्द व पीलिया जैसी बीमारी कई बार जानलेवा हो जाती है।