
नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। संस्कारधानी में गणेशोत्सव के पंडाल इस बार पर्यावरण संरक्षण के साथ स्थानीय स्मृतियों, सामाजिक सरोकारों और रचनात्मकता के मंच बनते दिखाई दे रहे हैं। ऐसी ही एक झांकी 30 अप्रैल को जबलपुर के बरगी डैम में हुए क्रूज हादसे में 13 लोगों की मौत और 28 पर्यटकों के बचने की घटना की है।

30 अप्रैल को जबलपुर के बरगी डैम में हुए क्रूज हादसे में 13 लोगों की मौत और 28 पर्यटकों के बचने की घटना आज भी लोगों के जेहन में है। हादसे के बाद सामने आई सबसे झकझोर देने वाली तस्वीर मां-बेटे की थी, जिसमें मां अपने बच्चे को सीने से लगाए मृत मिली थी।
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माटी के गणेश का संदेश अब केवल प्रतिमा तक सीमित नहीं है। कहीं हाल की घटना को झांकी के माध्यम से याद किया गया है तो कहीं प्राकृतिक गुफा की कल्पना को साकार कर उसके मध्य माटी के गणपति विराजे हैं। रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय के कर्मचारी लगातार 11वें वर्ष माटी के गणेश स्थापित कर इस अभियान को परंपरा में बदलने की दिशा में आगे बढ़ा रहे हैं। इन प्रयासों में एक बात साझा है-गणपति माटी के हैं और उनके आसपास की कथा अपनी मिट्टी से जुड़ी है।

भूकंप कालोनी, गंगानगर निवासी आदर्श कुमार ने इस बार गणेशोत्सव को स्थानीय स्मृति से जोड़ा है। उन्होंने बरगी डेम क्रूज हादसे की झांकी तैयार की है और इसी के मध्य माटी के गणपति को विराजित किया है। झांकी लोगों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है।

गणेश प्रतिमा के साथ घटना को स्मरण करने वाली प्रस्तुति यह संदेश भी देती है कि उत्सव केवल सजावट और मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज की संवेदनाओं को अभिव्यक्त करने का अवसर भी हो सकता है।

रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय के कर्मचारियों ने माटी के गणेश स्थापित करने का संकल्प लगातार 11वें वर्ष भी निभाया है। कर्मचारियों की समिति ने आयोजन की अलग-अलग जिम्मेदारियां पहले ही बांट दी हैं।

पूजन से लेकर भंडारा और प्रसाद वितरण तक की व्यवस्थाएं कर्मचारी मिलकर संभाल रहे हैं। यहां माटी के गणेश अब एक वर्ष का अभियान नहीं, बल्कि सामूहिक सहभागिता से बनी ऐसी परंपरा हैं, जिसे कर्मचारी हर साल आगे बढ़ा रहे हैं।
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संस्कारधानी निवासी राजेश दलवी ने भी गणेशोत्सव में प्रकृति को केंद्र में रखा है। उनके 17 वर्षीय क्रियेटिव पुत्र मयूर दलवी ने प्राकृतिक गुफा की झांकी तैयार की है। इसी गुफा के मध्य माटी के गणेश विराजमान हैं।
कृत्रिम सजावट के बीच प्रकृति का स्वरूप देने वाली यह प्रस्तुति श्रद्धालुओं को आकर्षित कर रही है। माटी की प्रतिमा और गुफा की थीम मिलकर गणेशोत्सव को पर्यावरण के करीब ले जाती दिखाई देती है।
इन उदाहरणों में गणेशोत्सव का एक नया कलेवर दिखाई देता है। माटी के गणेश अभियान ने प्रतिमा के माध्यम से पर्यावरण की बात उठाई, लेकिन अब पंडालों की रचनात्मकता उस संदेश को और विस्तार दे रही है।
संस्कारधानी की यही विशेषता है कि यहां उत्सव केवल मनाया नहीं जाता, उसे अपनी मिट्टी, अपनी स्मृतियों और अपनी संवेदनाओं से जोड़ा जाता है। माटी के गणेश इसी परंपरा को इस बार एक कदम और आगे ले जाते नजर आ रहे हैं।
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