
नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि पालन-पोषण करने वाली नानी केवल इस आधार पर नाबालिग नातिन के भरण-पोषण का दावा करने से वंचित नहीं की जा सकती कि वह विधिवत नियुक्त कानूनी अभिभावक नहीं है।
न्यायमूर्ति द्वारकाधीश बंसल की एकलपीठ ने फैमिली कोर्ट द्वारा अंतरिम भरण-पोषण का आवेदन खारिज करने का आदेश निरस्त करते हुए मामले की दोबारा सुनवाई के निर्देश दिए हैं।
याचिका के अनुसार, उनकी बेटी सपना चौरसिया का विवाह शैलेंद्र चौरसिया से हुआ था। सपना ने 26 सितंबर 2015 को सिद्धि को जन्म दिया। बीमारी के कारण 19 मई 2018 को बेटी सपना की मृत्यु हो गई थी। सिद्धि अपनी नानी के पास रह रही है और वही उसका पालन-पोषण कर रही हैं।
बच्ची के भरण-पोषण का खर्च उठाना कठिन होने पर सविता ने जनवरी 2019 में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत आवेदन प्रस्तुत कर अंतरिम भरण-पोषण की मांग की थी। फैमिली कोर्ट ने पांच सितंबर 2022 को यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया कि सविता को बच्ची का विधिवत कानूनी अभिभावक नियुक्त नहीं किया गया है।
हाई कोर्ट ने मामले के तथ्यों और विभिन्न उच्च न्यायालयों के निर्णयों पर विचार करते हुए कहा कि भरण-पोषण संबंधी प्रविधानों की व्याख्या इस तरह की जानी चाहिए, जिससे असहाय बच्चों को न्याय मिल सके।
बच्ची के अधिकारों को केवल इस आधार पर बाधित नहीं किया जा सकता कि उसकी ओर से आवेदन करने वाली नानी विधिवत नियुक्त कानूनी अभिभावक नहीं है। इसी दृष्टिकोण के साथ एकलपीठ ने फैमिली कोर्ट का आदेश निरस्त कर प्रकरण की पुनः सुनवाई करने और नए सिरे से आदेश पारित करने के निर्देश दिए।
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