
नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। प्रदेश के बिजली उपभोक्ताओं के लिए सितंबर-अक्टूबर के बिल में ईंधन एवं बिजली खरीदी समायोजन सरचार्ज (एफपीपीएएस) का भार बढ़ गया है। 24 सितंबर से 23 अक्टूबर तक जारी होने वाले बिजली बिलों में अब 5.063 प्रतिशत की दर से एफपीपीएएस जोड़ा जाएगा। इससे पहले यह दर 4.59 प्रतिशत थी। यानी सरचार्ज में 0.473 प्रतिशत अंक की वृद्धि हुई है।
एफपीपीएएस बिजली के ऊर्जा शुल्क पर लगाया जाता है, इसलिए इसका वास्तविक असर उपभोक्ता की मासिक खपत और लागू स्लैब पर निर्भर करेगा। मसलन, 300 यूनिट की खपत पर यदि ऊर्जा शुल्क 1576.50 रुपये है तो 5.063 प्रतिशत के हिसाब से एफपीपीएएस करीब 79.82 रुपये बनेगा। इसी तरह 500 यूनिट की खपत पर 3024.50 रुपये ऊर्जा शुल्क होने पर सरचार्ज करीब 153.23 रुपये होगा।
बिजली मामलों के जानकार एवं सेवानिवृत्त एडिशनल चीफ इंजीनियर राजेंद्र अग्रवाल के अनुसार, पिछली 4.59 प्रतिशत दर की तुलना में नई दर से 100 यूनिट की खपत पर करीब 2.46 रुपये, 200 यूनिट पर 4.12 रुपये, 300 यूनिट पर 7.46 रुपये और 500 यूनिट पर करीब 14.31 रुपये अतिरिक्त भार पड़ेगा।
उन्होंने बताया कि केवल एफपीपीएएस की दर में हुई वृद्धि के आधार पर बिल में होने वाली कुल बढ़ोतरी का आकलन नहीं किया जा सकता। वास्तविक बिल में फिक्स्ड चार्ज, बिजली शुल्क, मीटर शुल्क, सब्सिडी सहित अन्य मद भी शामिल होते हैं।
मौजूदा दर व्यवस्था में शुरुआती 50 यूनिट के लिए ऊर्जा शुल्क 4.71 रुपये प्रति यूनिट, 51 से 150 यूनिट तक 5.67 रुपये, 151 से 300 यूनिट तक 7.05 रुपये और 300 यूनिट से अधिक खपत पर 7.24 रुपये प्रति यूनिट है। ऐसे में एफपीपीएएस का प्रभाव सभी उपभोक्ताओं पर समान राशि के रूप में नहीं पड़ता। ऊर्जा शुल्क के आधार पर इसका प्रभाव करीब 24 से 37 पैसे प्रति यूनिट के बीच रहता है।
बिजली उत्पादन और खरीदी की लागत हर महीने एक जैसी नहीं रहती। कोयला, ईंधन तथा बिजली खरीदी की कीमतों में होने वाले बदलाव के आधार पर लागत का समायोजन किया जाता है। लागत बढ़ने पर एफपीपीएएस बढ़ सकता है और लागत घटने पर इसमें कमी भी हो सकती है। इसलिए इसे बिजली की मूल दर में स्थायी वृद्धि नहीं माना जाता।
राजेंद्र अग्रवाल के मुताबिक, 5.063 प्रतिशत एफपीपीएएस पूरे बिजली बिल पर नहीं लगाया जाता। यह केवल ऊर्जा शुल्क पर लागू होता है। बिल में ऊर्जा शुल्क और एफपीपीएएस की राशि अलग-अलग दर्शाई जाती है। इसके अतिरिक्त बाद में वास्तविक लागत के आधार पर टू-अप का प्रावधान भी हो सकता है।
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