
MP डेस्क, जबलपुर. मध्य प्रदेश में हाथियों और अन्य जंगली जानवरों ने किसानों की फसलों को काफी निकसान पहुंचाया था। इस पर जबलपुर हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने साफकहा है कि जंगली जानवरों से होने वाली तबाही का आर्थिक बोझ सिर्फ किसानों के कंधों पर नहीं डाला जा सकता। इसलिए सरकार को 4 सप्ताह के अंदर फसल क्षति मुआवजे के लिए एक औपचारिक और ठोस गाइडलाइन तैयार करना होगा।
दरअसल, यह मामला 2018 से लंबित एक जनहित याचिका से जुड़ा हुआ है। इस मामले की सुनवाई जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की बेंच ने की। अगली सुनवाई 4 हफ्ते बाद होगी।
कोर्ट ने क्या हुआ..
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने कोर्ट में दलील दी- हाथियों और जंगली जानवरों से अपनी मेहनत की फसल बचाने के लिए मजबूरन कई किसान खेतों की फेंसिंग (तारों) में करंट छोड़ देते हैं। इस वजह से हाथियों समेत कई बेजुबान जानवरों की दर्दनाक मौत हो जाती है। यदि सरकार किसानों को समय पर और सही मुआवजा दे, तो किसान फसल बचाने के लिए ऐसे जानलेवा और खतरनाक हथकंडे नहीं अपनाएंगे।
इसके अलावा सुनवाई के दौरान 'कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान' से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले का भी हवाला दिया गया। वकील ने कहा- सुप्रीम कोर्ट ने भी फसल नुकसान की भरपाई के लिए एक मॉडल नीति बनाने के निर्देश दिए हैं।
छत्तीसगढ़ और तमिलनाडु मॉडल से सीखे मध्य प्रदेश सरकार
इस पर हाईकोर्ट ने मध्य प्रदेश सरकार को अंतिम मौका देते हुए जल्द से जल्द नई गाइडलाइन तैयार करने को कहा। HC ने मध्य प्रदेश में वन्यजीव और किसान संघर्ष को रोकने के लिए दूसरे राज्यों के सफल मॉडल्स का जिक्र भी किया किया। कोर्ट ने कहा- छत्तीसगढ़ का 'हाथी मित्र' ऐप का एग्जाम्पल लिया जा सकता है। इस मोबाइल ऐप के जरिए हाथियों की लोकेशन की जानकारी मिलती है, जिससे किसान और ग्रामीण पहले ही सतर्क हो जाते हैं। इसके अलावा तमिलनाडु का 'अलर्ट सिस्टम' तकनीक से रेलवे ट्रैक और इंसानी बस्तियों के पास हाथियों की मौजूदगी की जानकारी तुरंत रेलवे और संबंधित विभाग को मिल जाती है। इसलिए सरकार छत्तीसगढ़ और तमिलनाडु की इन तकनीकों और मॉडल्स का गहराई से अध्ययन करें। एक ऐसी आधुनिक व्यवस्था विकसित की जाए जिससे किसानों की फसल भी सुरक्षित रहे और जंगली जानवरों की जान भी न जाए।
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