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'सभी मुकदमों के लिए एक फॉर्मूला संभव नहीं', एमपी हाई कोर्ट ने खारिज की जनहित याचिका, जानें पूरा मामला

मुख्य न्यायाधीश अल्पेश यशवंत कोगजे व न्यायमूर्ति विवेक रूसिया की युगलपीठ ने स्पष्ट किया कि सभी मामलों के लिए एक जैसा स्ट्रेटजैकेट फार्मूला तय करना न्य...और पढ़ें

By Surendra DubeyEdited By: ADITYA KUMAR
Publish Date: Thu, 24 Sep 2026 03:49:45 PM (IST)Updated Date: Thu, 24 Sep 2026 03:49:45 PM (IST)
'सभी मुकदमों के लिए एक फॉर्मूला संभव नहीं', एमपी हाई कोर्ट ने खारिज की जनहित याचिका, जानें पूरा मामला
एमपी हाई कोर्ट

HighLights

  1. मुकदमों के निपटारे के लिए एक समान SOP लागू नहीं हो सकती: HC
  2. हर केस के तथ्य अलग; जज को निर्णय लेने की स्वतंत्रता जरूरी
  3. स्टाफ व संसाधनों की कमी भी देरी का मुख्य कारण: हाई कोर्ट

नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। मुकदमों के निपटारे में देरी रोकने के लिए अदालतों पर एक समान प्रक्रिया या सख्त एसओपी लागू नहीं की जा सकती। प्रत्येक मामले की परिस्थितियां अलग होती हैं और न्यायिक प्रक्रिया में संबंधित न्यायाधीश को मामले के तथ्यों के अनुरूप निर्णय लेने की स्वतंत्रता होती है।

हाई कोर्ट ने मुकदमों में देरी को लेकर दायर जनहित याचिका का निराकरण करते हुए यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की। मुख्य न्यायाधीश अल्पेश यशवंत कोगजे व न्यायमूर्ति विवेक रूसिया की युगलपीठ ने स्पष्ट किया कि सभी मामलों के लिए एक जैसा स्ट्रेटजैकेट फार्मूला तय करना न्यायिक प्रक्रिया के अनुरूप नहीं होगा।


याचिकाकर्ताओं ने बार-बार तारीख और स्थगन रोकने की मांग की थी

अधिवक्ता आनंद चावला और विद्या शंकर मिश्रा ने जनहित याचिका दायर कर सिविल अदालतों और हाई कोर्ट में मुकदमों की सुनवाई में होने वाली देरी को रोकने के लिए समान गाइडलाइन बनाने की मांग की थी। याचिका में बार-बार तारीख दिए जाने, स्थगन और अंतरिम आवेदनों के कारण अंतिम निर्णय में होने वाली देरी का मुद्दा उठाया गया था।

याचिकाकर्ताओं का कहना था कि इन कारणों से मामलों के निपटारे में तीन से चार माह तक की अनावश्यक देरी होती है। झूठी याचिकाओं और गलत हलफनामों पर भारी जुर्माना लगाए जाने की मांग भी की गई थी। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक लालवानी और अधिवक्ता यश राज पटेल, हाई कोर्ट की ओर से अधिवक्ता संदीप कुमार शुक्ला व राज्य सरकार की ओर से शासकीय अधिवक्ता राजवर्धन दत्त पड़रहा उपस्थित हुए।

प्राकृतिक न्याय को बताया न्यायिक प्रक्रिया का मूल आधार

कोर्ट ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया का मूल आधार प्राकृतिक न्याय है। किसी पक्ष की ओर से अंतरिम आवेदन प्रस्तुत किया जाता है तो संबंधित न्यायाधीश का दायित्व है कि दूसरे पक्ष को सुनवाई और जवाब देने का अवसर प्रदान किया जाए।

ऐसी स्थिति में आवेदन पर सुनवाई और आदेश पारित करने में लगने वाले समय को मात्र मुकदमे में देरी नहीं माना जा सकता। हर मामले को उसके तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर देखना आवश्यक है।

केवल स्थगन नहीं, संसाधनों की कमी भी बड़ी वजह

हाई कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मुकदमों के लंबित रहने के लिए केवल स्थगन को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। न्यायाधीशों और लंबित मामलों के अनुपात के अलावा न्यायालयीन व्यवस्था से जुड़ी कई व्यावहारिक समस्याएं भी निपटारे की गति को प्रभावित करती हैं। इनमें कोर्ट रूम की कमी, न्यायिक बुनियादी ढांचे का अभाव, न्यायाधीशों के रिक्त पद और मंत्रालयिक स्टाफ की कमी प्रमुख हैं।

अदालत के आदेश का सार यह है कि मुकदमों के शीघ्र निपटारे के लिए केवल कठोर दिशा-निर्देश बनाना पर्याप्त उपाय नहीं है। न्यायिक अधिकारियों की पर्याप्त उपलब्धता के साथ कोर्ट रूम, बुनियादी ढांचा और मंत्रालयिक स्टाफ जैसी आवश्यक सुविधाएं सुनिश्चित करना भी जरूरी है। कोर्ट ने इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में हर मुकदमे के लिए एक समान प्रक्रिया निर्धारित करने की मांग को स्वीकार नहीं किया और जनहित याचिका खारिज कर दी।

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