
नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। मध्य प्रदेश कर्मचारी चयन मंडल द्वारा 2 जुलाई 2026 को जारी सब-इंस्पेक्टर (एसआई) व सूबेदार भर्ती के अंतिम परिणाम तथा 27 अक्टूबर 2025 के भर्ती नियमों को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में चुनौती दी गई है। 14 कार्यरत पुलिसकर्मियों की याचिका पर सुनवाई के बाद कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया व न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की युगलपीठ ने फैसला सुरक्षित रख लिया।
याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क है कि उन्होंने ओपन कट-ऑफ से अधिक अंक हासिल किए, इसके बावजूद उन्हें ओपन मेरिट में स्थान देने के बजाय 15 प्रतिशत पुलिस विभागीय कोटे तक सीमित कर दिया गया। उनका कहना है कि ओपन श्रेणी किसी वर्ग विशेष के लिए आरक्षित नहीं होती, बल्कि इसमें सभी अभ्यर्थियों की योग्यता के आधार पर मेरिट बननी चाहिए।
याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के सौरव यादव, साधना सिंह डांगी और रामनरेश मामलों में प्रतिपादित सिद्धांतों का हवाला देते हुए कहा कि चयन प्रक्रिया में पहले ओपन मेरिट निर्धारित की जानी चाहिए और उसके बाद ही हॉरिजॉन्टल आरक्षण लागू किया जा सकता है।
याचिका में विशेष रूप से सूबेदार भर्ती के आंकड़ों का उल्लेख करते हुए कहा गया कि अनारक्षित पुलिस श्रेणी की कट-ऑफ 571.16 रही, जबकि अनारक्षित ओपन श्रेणी की कट-ऑफ 561.36 थी। याचिकाकर्ताओं के अनुसार यह स्थिति समानता के संवैधानिक अधिकारों से जुड़े अनुच्छेद 14 और 16 के विपरीत है।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने विभागीय अनुभव रखने वाले कार्यरत पुलिसकर्मियों और नए अभ्यर्थियों के बीच तुलना को लेकर मौखिक सवाल भी किए। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नमन नागरथ ने पक्ष रखा।
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याचिकाकर्ताओं का कहना है कि पुलिस सेवा में रहते हुए ड्यूटी के सीमित समय के बीच तैयारी करने के बावजूद उन्होंने ओपन कट-ऑफ से अधिक अंक हासिल किए हैं। ऐसे में केवल विभागीय कोटे में सीमित कर उनकी वास्तविक मेरिट की अनदेखी करना उचित नहीं है। अब हाई कोर्ट के निर्णय से यह स्पष्ट होगा कि भर्ती में ओपन मेरिट और हॉरिजॉन्टल विभागीय आरक्षण को किस क्रम में लागू किया जाना चाहिए।