
नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। हाई कोर्ट ने बहुचर्चित नर्सिंग घोटाला मामले में नर्सिंग कॉलेजों को मान्यता दिए जाने की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए हैं। जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि प्रदेश में ऐसे नर्सिंग कालेजों को भी मान्यता दी जा रही है, जो निर्धारित मानकों और आवश्यक आधारभूत सुविधाओं को पूरा नहीं करते। इस पर न्यायमूर्ति आनंद पाठक व न्यायमूर्ति बीपी शर्मा की युगलपीठ ने मध्यप्रदेश नर्सिंग नियामक परिषद से 10 दिन में जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। मामले की अगली सुनवाई नौ अक्टूबर को होगी।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से सवाल उठाया गया कि यदि किसी नर्सिंग कालेज में नियमानुसार आवश्यक भवन, प्रयोगशाला, प्रशिक्षण सहित अन्य सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं तो उसे मान्यता किस आधार पर दी जा रही है। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि कुछ संस्थानों में मूलभूत सुविधाओं के अभाव के बावजूद मान्यता प्रदान की गई। हालांकि ये आरोप फिलहाल याचिकाकर्ता के दावे हैं। हाई कोर्ट ने इन आरोपों पर कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है और परिषद से स्थिति स्पष्ट करने को कहा है।
कॉलेज के वास्तविक स्थान पर भी सवाल
कुछ नर्सिंग कालेजों के मान्यता आवेदनों में दर्ज भौगोलिक निर्देशांकों को लेकर भी आपत्ति उठाई गई। याचिकाकर्ता का आरोप है कि आवेदन में दर्ज स्थान संबंधी जानकारी और कालेज की वास्तविक स्थिति में अंतर है। इस पर भी परिषद को जवाब देना होगा। परिषद के जवाब से यह स्पष्ट होगा कि मान्यता देने से पहले कालेज के स्थान और उपलब्ध सुविधाओं का किस प्रकार सत्यापन किया गया।
नर्सिंग कालेजों की मान्यता और प्रदेश की नर्सिंग शिक्षा व्यवस्था में कथित अनियमितताओं को लेकर विधि विद्यार्थी संघ ने वर्ष 2022 में जनहित याचिका दायर की थी। याचिका क्रमांक डब्ल्यूपी-1080-2022 में नर्सिंग कालेजों की मान्यता प्रक्रिया सहित विद्यार्थियों की शिक्षा और प्रशिक्षण से जुड़े मुद्दे लगातार न्यायालय के समक्ष आते रहे हैं।
सुनवाई के दौरान उन विद्यार्थियों की पढ़ाई और प्रशिक्षण का मुद्दा भी उठा, जिन्हें सुविधाओं की कमी वाले कालेजों से योग्य कालेजों में स्थानांतरित किया गया है। महाधिवक्ता प्रशान्त सिंह ने न्यायालय को बताया कि इन विद्यार्थियों के लिए विशेष प्रशिक्षण व्यवस्था करना आवश्यक होगा। एएनएम, जीएनएम, बीएससी, एमएससी और पीबीएससी पाठ्यक्रमों के विद्यार्थियों के लिए अतिरिक्त कक्षाओं के माध्यम से सैद्धांतिक, प्रयोगात्मक और चिकित्सकीय प्रशिक्षण की व्यवस्था की आवश्यकता बताई गई।
युगलपीठ ने विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित न हो, इसके लिए संबंधित पक्षों को विशेष प्रशिक्षण पाठ्यक्रम और उसकी रूपरेखा तैयार करने को कहा है। इसका उद्देश्य स्थानांतरित विद्यार्थियों की सैद्धांतिक पढ़ाई के साथ प्रयोगात्मक और चिकित्सकीय प्रशिक्षण में हुई कमी को पूरा करना है। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता आलोक बगरेचा, राज्य सरकार की ओर से शासकीय अधिवक्ता राजेश तिवारी, मध्य प्रदेश नर्सिंग नियामक परिषद की ओर से महाधिवक्ता प्रशान्त सिंह और उप महाधिवक्ता अभिजीत अवस्थी उपस्थित हुए।
मध्यप्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू तथा भारतीय नर्सिंग परिषद की ओर से अधिवक्ता मोहन सौंसरकर ने पक्ष रखा। हाई कोर्ट ने मान्यता को लेकर लगाए गए आरोपों पर फिलहाल कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है। परिषद को 10 दिन में जवाब दाखिल करना है। नौ अक्टूबर को होने वाली अगली सुनवाई में परिषद के जवाब के साथ विद्यार्थियों के विशेष प्रशिक्षण की प्रस्तावित रूपरेखा पर भी सुनवाई होगी।