
नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। जिले में स्वास्थ्य सेवाएं अब सेवा नहीं, सौदेबाजी बनती जा रही हैं। दवा कंपनियों और निजी अस्पताल संचालकों व क्लीनिक संचालकों के बीच गहरी साठगांठ का खेल चल रहा है।
जानकारी के अनुसार, यह खेल बेहद सुनियोजित तरीके से चलता है। दवा कंपनी के मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव (एमआर) निजी अस्पतालों के संचालक डाॅक्टरों से मासिक टारगेट तय करते हैं। जितनी अधिक पर्ची पर उनकी कंपनी की दवा लिखी जाएगी, उतना बड़ा इनाम।
टारगेट पूरा करने पर डाॅक्टर को दुबई, सिंगापुर, थाईलैंड जैसे देशों की सैर, फाइव स्टार होटलों में सेमिनार के नाम पर पार्टियां और महंगे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण तक दिए जाते हैं।
चौंकाने वाली बात यह है कि अस्पतालों में दवा की दुकान भी परिसर के भीतर ही संचालित होती है। डाक्टर पर्ची पर वही दवा लिखते हैं, जो केवल उसी मेडिकल स्टोर पर उपलब्ध होती है। मरीज बाहर से सस्ती दवा नहीं खरीद सकता।
एक ही साल्ट की दवा बाजार में 50 रुपये में मिलती है, जबकि ब्रांडेड कंपनी की वही दवा 250 से 300 रुपये में बेची जाती है। अंतर की यह रकम कमीशन के रूप में बंट जाती है।
नाम न छापने की शर्त पर एक मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव ने बताया कि बड़े निजी अस्पतालों में तो कंपनी सीधे अस्पताल प्रबंधन से डील करती है। अस्पताल में भर्ती मरीज को आईवी फ्लूड, एंटीबायोटिक, इंजेक्शन सब निर्धारित कंपनी के ही लगाए जाते हैं। इसके बदले अस्पताल को 30 से 40 प्रतिशत तक का मार्जिन दिया जाता है। छोटे क्लीनिक संचालकों को प्रति माह 20 से 50 हजार रुपये तक का फिक्स ऑफर दिया जाता है।
इस साठगांठ का सबसे बड़ा शिकार गरीब और मध्यम वर्गीय मरीज हैं। सरकारी अस्पतालों में भीड़ और अव्यवस्था से तंग आकर लोग निजी अस्पतालों का रुख करते हैं, लेकिन वहां बिल देखकर उनके होश उड़ जाते हैं। 10 हजार के इलाज में 4 हजार रुपये सिर्फ दवाओं का बिल होता है, जिनमें से आधी दवाएं अनावश्यक होती हैं।
चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि अनावश्यक ब्रांडेड दवाएं और एंटीबायोटिक का अंधाधुंध उपयोग मरीजों के स्वास्थ्य के लिए भी खतरनाक है। इससे दवा प्रतिरोधक क्षमता बढ़ रही है। हालांकि, जिला स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी इस पर कार्रवाई की बात कहते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।
भारतीय चिकित्सा परिषद के नियमों के अनुसार, डाक्टरों द्वारा कंपनियों से उपहार या टूर लेना अनैतिक आचरण है, लेकिन नियम केवल कागजों तक सीमित हैं। स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की मांग है कि पर्ची पर जेनेरिक नाम लिखना अनिवार्य किया जाए, अस्पताल परिसर में निजी मेडिकल स्टोर पर प्रतिबंध लगे और दवा कंपनियों के गिफ्ट कल्चर की उच्च स्तरीय जांच हो। जब तक सख्त निगरानी नहीं होगी, तब तक मरीजों की जेब पर यह डाका जारी रहेगा।
इस बीच दवाइयों की गुणवत्ता, सुरक्षा और सप्लाई चेन में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए ड्रग टेक्निकल एडवाइजरी बोर्ड ने एक बहुत बड़ा और सख्त कदम उठाया है। जिसमें स्पष्ट कर दिया है कि दवाओं के थोक लाइसेंस के लिए अब सक्षम व्यक्ति के रूप में केवल और केवल 'रजिस्टर्ड फार्मासिस्ट की ही नियुक्ति होगी।
अब सिर्फ एक्सपीरियंस लेटर या सर्टिफिकेट के आधार पर थोक दवा व्यापार में एंट्री करने वालों का रास्ता हमेशा के लिए बंद हो गया है। केवल किसी डिग्री या आनलाइन सर्टिफिकेट के दम पर दवाओं का थोक कारोबार चलाने का सपना देख रहे थे तो संभल जाइए। दवा सप्लाई चेन की चाबी सिर्फ और सिर्फ असली फार्मासिस्टों के हाथों में होगी।