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MP हाई कोर्ट में 35 हजार से अधिक अवमानना केसों ने बढ़ाई चुनौती, आदेश के बाद भी समाप्त नहीं हो रहा विवाद, पक्षकार दोबारा कोर्ट पहुंच रहा

अवमानना प्रकरणों की 35 हजार से अधिक संख्या ने न्यायालय के सामने लंबित मामलों के निराकरण की चुनौती को और जटिल बना दिया है।

By Surendra DubeyEdited By: manoj dubey
Publish Date: Mon, 21 Sep 2026 11:29:09 AM (IST)Updated Date: Mon, 21 Sep 2026 11:40:43 AM (IST)
MP हाई कोर्ट में 35 हजार से अधिक अवमानना केसों ने बढ़ाई चुनौती, आदेश के बाद भी समाप्त नहीं हो रहा विवाद, पक्षकार दोबारा कोर्ट पहुंच रहा

HighLights

  1. अवमानना के रूप में उसी विवाद की दूसरी न्यायिक पारी शुरू हो रही
  2. मूल मामलों के निराकरण में लग रहा समय, निगरानी में भी खर्च
  3. मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में पहले से ही लंबित मामलों का बड़ा बोझ

सुरेन्द्र दुबे नईदुनिया जबलपुर। हाई कोर्ट में एक मुकदमे का आदेश होने के बाद भी विवाद समाप्त नहीं हो रहा है। आदेश का पालन नहीं होने पर वही पक्षकार दोबारा हाई कोर्ट पहुंच रहा है और अवमानना याचिका के रूप में उसी विवाद की दूसरी न्यायिक पारी शुरू हो रही है।

अवमानना प्रकरणों की 35 हजार से अधिक संख्या ने न्यायालय के सामने लंबित मामलों के निराकरण की चुनौती को और जटिल बना दिया है।

मूल याचिका में न्यायालय जहां अधिकार और विवाद का फैसला करता है, वहीं आदेश के बाद अवमानना याचिका में यह देखना पड़ता है कि संबंधित विभाग, अधिकारी या संस्था ने न्यायालय के निर्देश का पालन किया या नहीं। इस प्रक्रिया में नोटिस, जवाब, अनुपालन रिपोर्ट, व्यक्तिगत उपस्थिति और कई बार समय-सीमा तय करने जैसी न्यायिक कवायद करनी पड़ती है।


हाई कोर्ट में पहले से ही लंबित मामलों का बड़ा बोझ

हाई कोर्ट में पहले से ही लंबित मामलों का बड़ा बोझ है। मार्च 2025 के अंत में न्यायालय में लंबित प्रकरणों की संख्या 4.71 लाख से अधिक थी। ऐसे में आदेशों के समय पर पालन नहीं होने से उत्पन्न अवमानना प्रकरण न्यायालय के अतिरिक्त समय और संसाधनों की मांग करते हैं।

इसका असर सीधे तौर पर मूल मामलों के निराकरण की गति पर पड़ने की स्थिति बनती है। हाल के मामलों में भी न्यायालय को अधिकारियों के खिलाफ कड़ा रुख अपनाना पड़ा है।

न्यायालय ने नोटिस से आगे बढ़कर वारंट तक जारी किए

कई मामलों में आदेश के बावजूद अनुपालन रिपोर्ट पेश नहीं होने अथवा संबंधित अधिकारियों की उपस्थिति नहीं होने पर न्यायालय ने नोटिस से आगे बढ़कर वारंट तक जारी किए हैं। सितंबर में जस्टिस विवेक जैन की एकलपीठ ने एक अवमानना प्रकरण में तत्कालीन प्रमुख सचिव राजस्व और सागर के तत्कालीन कलेक्टर के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किए थे।

आदेश के बाद भी खत्म नहीं होता मुकदमा

अवमानना कानून का उद्देश्य न्यायालय के आदेश की गरिमा और प्रभावशीलता बनाए रखना है। इसलिए अवमानना याचिकाओं की आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता। असल समस्या उस स्थिति में पैदा होती है जब किसी आदेश के पालन के लिए बार-बार न्यायालय की निगरानी आवश्यक हो जाती है।

यदि विभागीय स्तर पर आदेश मिलते ही उसकी अनुपालन प्रक्रिया शुरू हो और समय-सीमा के भीतर रिपोर्ट न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत हो जाए तो बड़ी संख्या में अवमानना याचिकाओं की नौबत टाली जा सकती है।

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