
नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। नाबालिग आदिवासी बालिका से दुष्कर्म के गंभीर आरोपों के मामले में विशेष अदालत ने साक्ष्यों के अभाव में आरोपी को दोषमुक्त कर दिया।
अदालत ने डीएनए रिपोर्ट, चिकित्सीय साक्ष्य और बयानों में सामने आई विसंगतियों को फैसले का महत्वपूर्ण आधार माना। विशेष न्यायाधीश (एससी-एसटी एवं पाक्सो) अभिलाषा एनआर मनवार की अदालत ने स्पष्ट किया कि पाक्सो एक्ट की धारा 29 और 30 के तहत वैधानिक उपधारणा लागू करने के लिए अभियोजन को पहले आवश्यक आधारभूत तथ्य स्थापित करने होंगे।
अभियोजन के अनुसार, पाटन निवासी सौरभ लोधी ने 15 अप्रैल 2025 से 31 मार्च 2026 के बीच शादी का प्रलोभन देकर नाबालिग से बार-बार शारीरिक संबंध बनाए। पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता, पाक्सो एक्ट और एससी-एसटी एक्ट की विभिन्न धाराओं के तहत प्रकरण दर्ज कर आरोपपत्र पेश किया था।
बचाव पक्ष की ओर से अधिवक्ता धनराज सिंह चौधरी और शशिभूषण सिंह चौधरी ने दलील दी कि डीएनए रिपोर्ट आरोप की पुष्टि नहीं करती और चिकित्सीय साक्ष्य भी अभियोजन के कथन का समर्थन नहीं करते। पीड़िता की अवयस्कता के प्रमाण तथा पुलिस को दिए गए कथनों और अदालत में दर्ज बयानों के बीच अंतर पर भी सवाल उठाए गए।
अदालत ने समग्र साक्ष्यों के मूल्यांकन के बाद निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन आरोपों को युक्तियुक्त संदेह से परे प्रमाणित करने में असफल रहा। फैसले में रेखांकित किया गया कि गंभीर आरोप अपने आप में दोषसिद्धि का आधार नहीं बन सकते।
पाक्सो कानून में निर्धारित वैधानिक उपधारणाओं का सहारा लेने से पहले अभियोजन को मामले के आवश्यक आधारभूत तथ्य प्रमाणित करने होते हैं।
अदालत ने घटना प्रमाणित नहीं होने के आधार पर पाक्सो एक्ट की धारा 33(8) के तहत पीड़िता को प्रतिकर दिए जाने का औचित्य भी नहीं माना। आरोपी को तत्काल जेल से रिहा करने का आदेश दिया गया, बशर्ते वह किसी अन्य मामले में वांछित न हो।
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