
नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर: इस महादेश के वैज्ञानिक और प्रगतिशील वैचारिक विकास के लिए संकल्पित साहित्यिक पत्रिका ‘पहल’ के संपादक और विख्यात कथाकार ज्ञानरंजन का सात जनवरी को रात्रि 10.30 बजे जबलपुर में निधन हो गया। वे 90 वर्ष के थे। उन्हें उसी दिन सुबह उपचार के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया था। उनके निधन से हिंदी साहित्य के एक महत्वपूर्ण युग का अंत हो गया है।
ज्ञानरंजन को एक अप्रतिम कथाकार, सशक्त गद्यकार और यशस्वी संपादक के रूप में जाना जाता है। उनके जाने से देश की प्रगतिशील साहित्यिक चेतना का एक सशक्त स्वर शांत हो गया। वे साठोत्तरी कहानी आंदोलन के प्रमुख हस्ताक्षरों में गिने जाते थे।
ज्ञानरंजन का जन्म 21 नवंबर 1936 को हुआ था। वे वरिष्ठ साहित्यकार रामनाथ सुमन के पुत्र थे। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त की और बाद में जबलपुर के जीएस कॉलेज में हिंदी के प्रोफेसर के रूप में अध्यापन किया। वे वर्ष 1996 में जीएस कॉलेज से सेवानिवृत्त हुए।
उनकी पहली कहानी ‘दिवास्वप्नी’ थी। इसके बाद ‘कबाड़खाना’, ‘क्षणजीवी’, ‘सपना नहीं’, ‘फेंस के इधर और उधर’ तथा ‘प्रतिनिधि कहानियां’ जैसे संग्रहों के माध्यम से उन्होंने हिंदी कथा साहित्य में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। उनकी कहानियां काव्यात्मकता, भाषा के अनूठे प्रयोग, तीखे तेवर और नई कहन शैली के लिए विशेष रूप से चर्चित रहीं।
ज्ञानरंजन ‘चार यार’ के रूप में प्रसिद्ध साठोत्तरी पीढ़ी के समूह का हिस्सा थे, जिसमें दूधनाथ सिंह, काशीनाथ सिंह और रवींद्र कालिया शामिल थे। उन्होंने लगभग 35 वर्षों तक ‘पहल’ पत्रिका का सफल संपादन और प्रकाशन किया, जो हिंदी की महत्वपूर्ण साहित्यिक पत्रिकाओं में मानी जाती है।
उन्हें सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड, साहित्य भूषण सम्मान, शिखर सम्मान, मैथिलीशरण गुप्त सम्मान और ज्ञानपीठ का ज्ञानगरिमा मानद अलंकरण सहित अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया। उनकी कहानियों का भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुआ है और वे कई विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में शामिल हैं। उनके जीवन और कृतित्व पर भारतीय दूरदर्शन द्वारा एक फिल्म का निर्माण भी किया गया है।