
नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। करीब तीन दशक तक चले कानूनी विवाद के बाद तत्कालीन पटवारी मुन्ना लाल को 300 रुपये रिश्वत लेने के मामले में हाई कोर्ट से राहत मिली है।
न्यायमूर्ति संजय एस. कलगांवकर की एकलपीठ ने सरकार की अपील खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा पटवारी को दोषमुक्त किए जाने के आदेश को उचित ठहराया है।
सरकार ने सागर जिले के खुरई क्षेत्र में पदस्थ तत्कालीन पटवारी मुन्ना लाल को 300 रुपये रिश्वत लेने के आरोप से जिला न्यायालय द्वारा दोषमुक्त किए जाने के खिलाफ वर्ष 1998 में हाईकोर्ट में अपील दायर की थी।
जिला न्यायालय ने दिसंबर 1997 में उसे दोषमुक्त कर दिया था। एकलपीठ ने सुनवाई के दौरान पाया कि अभियोजन के लिए यह विश्वसनीय रूप से साबित करना आवश्यक था कि रकम अवैध रूप से मांगी और स्वीकार की गई थी।
रिश्वत मांग से संबंधित मूल रिकाॅर्डिंग ट्रायल कोर्ट में सत्यापित नहीं हुई थी। आरोपी की आवाज की पहचान भी नहीं कराई गई और रिकार्डिंग की पूर्णता व शुद्धता के संबंध में पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए गए। ऐसे में रिकाॅर्डिंग के ट्रांसक्रिप्ट को रिश्वत की मांग का विश्वसनीय प्रमाण नहीं माना जा सकता।
न्यायालय ने यह भी पाया कि राजस्व रिकाॅर्ड के अनुसार शिकायतकर्ता वीर सिंह पर 325 रुपये और ब्याज की सरकारी बकाया राशि थी। गवाहों और दस्तावेजों से यह संभावना सामने आती थी कि बरामद 300 रुपये सरकारी बकाया की अदायगी से संबंधित हो सकते हैं।
शिकायतकर्ता के बयान में भी महत्वपूर्ण असंगतियां थीं। अलग-अलग अवसरों पर उसने रिश्वत की मांग 450 और 500 रुपये बताए जाने की बात कही। रिश्वत की मांग किन लोगों की मौजूदगी में की गई, इस संबंध में भी अलग-अलग बयान सामने आए।
एकलपीठ ने कहा कि केवल रकम की बरामदगी और फिनाल्फ्थेलीन परीक्षण से रिश्वत मांगने तथा उसे अवैध रूप से स्वीकार करने का अपराध सिद्ध नहीं होता। ट्रायल कोर्ट का दोषमुक्ति का निष्कर्ष साक्ष्यों पर आधारित और उचित है, इसलिए उसमें हस्तक्षेप का आधार नहीं है। इस टिप्पणी के साथ एकलपीठ ने सरकार की अपील निरस्त कर दी।
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