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तीन दशक बाद हुआ 300 रुपये रिश्वत मामले का निराकरण, तत्कालीन पटवारी को हाई कोर्ट से राहत

अभियोजन के अनुसार 17 अक्टूबर 1996 को डुप्लीकेट भू-अधिकार एवं ऋण पुस्तिका जारी करने के एवज में शिकायतकर्ता वीर सिंह से 300 रुपये रिश्वत लेते हुए लोकायु...और पढ़ें

By Surendra DubeyEdited By: Dheeraj kumar Bajpai
Publish Date: Wed, 30 Sep 2026 09:14:24 PM (IST)Updated Date: Wed, 30 Sep 2026 09:14:24 PM (IST)
तीन दशक बाद हुआ 300 रुपये रिश्वत मामले का निराकरण, तत्कालीन पटवारी को हाई कोर्ट से राहत
न्यायालय ने यह भी पाया कि राजस्व रिकाॅर्ड के अनुसार शिकायतकर्ता वीर सिंह पर 325 रुपये और ब्याज की सरकारी बकाया राशि थी।

HighLights

  1. कानूनी विवाद के बाद सरकार की अपील खारिज
  2. ट्रायल कोर्ट आदेश को हाई कोर्ट ने उचित ठहराया
  3. सागर जिले के खुरई में पदस्थ थे तत्कालीन पटवारी

नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। करीब तीन दशक तक चले कानूनी विवाद के बाद तत्कालीन पटवारी मुन्ना लाल को 300 रुपये रिश्वत लेने के मामले में हाई कोर्ट से राहत मिली है।

दोषमुक्त किए जाने का आदेश उचित

न्यायमूर्ति संजय एस. कलगांवकर की एकलपीठ ने सरकार की अपील खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा पटवारी को दोषमुक्त किए जाने के आदेश को उचित ठहराया है।

1998 में हाईकोर्ट में अपील दायर की थी

सरकार ने सागर जिले के खुरई क्षेत्र में पदस्थ तत्कालीन पटवारी मुन्ना लाल को 300 रुपये रिश्वत लेने के आरोप से जिला न्यायालय द्वारा दोषमुक्त किए जाने के खिलाफ वर्ष 1998 में हाईकोर्ट में अपील दायर की थी।

रकम अवैध रूप से मांगी और स्वीकार की गई थी

जिला न्यायालय ने दिसंबर 1997 में उसे दोषमुक्त कर दिया था। एकलपीठ ने सुनवाई के दौरान पाया कि अभियोजन के लिए यह विश्वसनीय रूप से साबित करना आवश्यक था कि रकम अवैध रूप से मांगी और स्वीकार की गई थी।

मूल रिकाॅर्डिंग ट्रायल कोर्ट में सत्यापित नहीं हुई थी

रिश्वत मांग से संबंधित मूल रिकाॅर्डिंग ट्रायल कोर्ट में सत्यापित नहीं हुई थी। आरोपी की आवाज की पहचान भी नहीं कराई गई और रिकार्डिंग की पूर्णता व शुद्धता के संबंध में पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए गए। ऐसे में रिकाॅर्डिंग के ट्रांसक्रिप्ट को रिश्वत की मांग का विश्वसनीय प्रमाण नहीं माना जा सकता।


325 रुपये और ब्याज की सरकारी बकाया राशि थी

न्यायालय ने यह भी पाया कि राजस्व रिकाॅर्ड के अनुसार शिकायतकर्ता वीर सिंह पर 325 रुपये और ब्याज की सरकारी बकाया राशि थी। गवाहों और दस्तावेजों से यह संभावना सामने आती थी कि बरामद 300 रुपये सरकारी बकाया की अदायगी से संबंधित हो सकते हैं।

बयान में भी महत्वपूर्ण असंगतियां थीं

शिकायतकर्ता के बयान में भी महत्वपूर्ण असंगतियां थीं। अलग-अलग अवसरों पर उसने रिश्वत की मांग 450 और 500 रुपये बताए जाने की बात कही। रिश्वत की मांग किन लोगों की मौजूदगी में की गई, इस संबंध में भी अलग-अलग बयान सामने आए।

रिश्वत मांगने का अपराध सिद्ध नहीं होता

एकलपीठ ने कहा कि केवल रकम की बरामदगी और फिनाल्फ्थेलीन परीक्षण से रिश्वत मांगने तथा उसे अवैध रूप से स्वीकार करने का अपराध सिद्ध नहीं होता। ट्रायल कोर्ट का दोषमुक्ति का निष्कर्ष साक्ष्यों पर आधारित और उचित है, इसलिए उसमें हस्तक्षेप का आधार नहीं है। इस टिप्पणी के साथ एकलपीठ ने सरकार की अपील निरस्त कर दी।

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