
नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। हाई कोर्ट ने कहा है कि एफआईआर दर्ज कराने की मांग के चरण में इलेक्ट्राॅनिक मीडिया के सामने मृतक द्वारा कथित रूप से दिया गया बयान निर्णायक रूप से मृत्यु पूर्व बयान नहीं माना जा सकता। उसकी प्रामाणिकता और साक्ष्य के रूप में अहमियत अन्य साक्ष्यों के आधार पर तय होगी।
न्यायमूर्ति हिमांशु जोशी की पीठ ने पति की मौत के मामले में पुलिसकर्मियों के विरुद्ध एफआईआर दर्ज कराने की मांग वाली पूनम कुशवाहा की याचिका निरस्त कर दी।
मामले के अनुसार पूनम कुशवाहा ने आरोप लगाया था कि 16 अप्रैल 2020 को लाकडाउन के दौरान खेत से लौटते समय जबलपुर के गोराबाजार थाने में पदस्थ एक पुलिस अधिकारी ने उसके पति बंशीलाल कुशवाहा के साथ मारपीट की थी। 20 अप्रैल को उसकी मौत हो गई। याचिकाकर्ता का दावा था कि मृत्यु से पहले बंशीलाल ने इलेक्ट्राॅनिक मीडिया के सामने संबंधित पुलिस अधिकारी का नाम लिया था।
पत्नी ने अपने आरोप के समर्थन में फोटो, समाचार पत्रों की कतरनें, मर्ग से संबंधित दस्तावेज और 50 हजार रुपये की अनुग्रह राशि दिए जाने का उल्लेख किया। मजिस्ट्रेट ने मर्ग जांच में आरोप की पुष्टि नहीं होने पर धारा 156(3) के तहत एफआइआर दर्ज करने का आदेश नहीं दिया। हालांकि आवेदन को धारा 200 के तहत निजी शिकायत के रूप में आगे बढ़ाने की अनुमति दी। सत्र अदालत ने भी मजिस्ट्रेट के आदेश को बरकरार रखा।
हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि केवल अनुग्रह राशि दिए जाने से हत्या या पुलिस की भूमिका सिद्ध नहीं होती। इलेक्ट्राॅनिक मीडिया के सामने कथित बयान को भी इस स्तर पर निर्णायक मृत्यु पूर्व बयान नहीं माना जा सकता। उसकी विश्वसनीयता और साक्ष्य के रूप में उपयोगिता का परीक्षण उचित कार्यवाही में साक्ष्यों के आधार पर किया जा सकता है।
कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता मजिस्ट्रेट के समक्ष साक्ष्य प्रस्तुत कर सकती है और धारा 200 तथा 202 के तहत शिकायत की कार्यवाही आगे बढ़ सकती है। अधीनस्थ अदालतों के आदेशों में कोई गंभीर कानूनी त्रुटि नहीं पाए जाने पर हाई कोर्ट ने याचिका निरस्त कर दी।
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