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सुप्रीम कोर्ट का फैसला... MP के न्यायिक अधिकारी की बर्खास्तगी निरस्त, कहा- सिर्फ गलत फैसले पर जजों को सजा नहीं

सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन की युगलपीठ ने सोमवार को मध्य प्रदेश के एक न्यायिक अधिकारी की बर्खास्तगी को इ...और पढ़ें

By Digital DeskEdited By: ADITYA KUMAR
Publish Date: Tue, 06 Jan 2026 12:06:49 PM (IST)Updated Date: Tue, 06 Jan 2026 12:06:49 PM (IST)
सुप्रीम कोर्ट का फैसला... MP के न्यायिक अधिकारी की बर्खास्तगी निरस्त, कहा- सिर्फ गलत फैसले पर जजों को सजा नहीं
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

HighLights

  1. गलत आदेश मात्र पर जजों के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई गलत: SC
  2. प्रशासनिक भय से जमानत न रोकें निचली अदालतें, विवेक का करें उपयोग
  3. जजों के खिलाफ झूठी शिकायत करने वालों पर अब होगी अवमानना की कार्रवाई

नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन की युगलपीठ ने सोमवार को मध्य प्रदेश के एक न्यायिक अधिकारी की बर्खास्तगी को इस टिप्पणी के साथ निरस्त कर दिया कि जिला न्यायपालिका के सदस्यों के विरुद्ध कथित तौर पर गलत या त्रुटिपूर्ण न्यायिक आदेश पारित करने के लिए अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू नहीं की जा सकती। सुप्रीम कोर्ट ने निर्भय सिंह सुलिया की अपील को मंज़ूरी दे दी, जिन्हें 2014 में भ्रष्टाचार के आरोपों और एक्साइज एक्ट के तहत बेल एप्लीकेशन पर फैसला करने में दोहरा मापदंड अपनाने के आरोप में एडिशनल डिस्ट्रिक्ट और सेशंस जज के पद से हटा दिया गया था।

हाईकोर्ट को सावधानी बरतने के निर्देश

यह कार्रवाई हाई कोर्ट द्वारा शुरू की गई एक डिपार्टमेंटल जांच के बाद की गई, जिसमें उन पर आरोप था कि उन्होंने मध्य प्रदेश एक्साइज एक्ट की धारा 34 (2) के तहत दर्ज मामलों में जमानत याचिकाओं पर फैसला करते समय दोहरा मापदंड अपनाया था। आरोप था कि उन्होंने कुछ मामलों में 50 बल्क लीटर से ज़्यादा शराब ज़ब्त होने के बावजूद जमानत दे दी, जबकि कई दूसरे ऐसे ही मामलों में यह कहते हुए जमानत निरस्त कर दी कि जब्त की गई मात्रा 50 बल्क लीटर से ज़्यादा होने के कारण जमानत नहीं दी जा सकती। सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि हाई कोर्ट को न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू करते समय बहुत सावधानी बरतनी चाहिए।


न्यायिक स्वतंत्रता और जमानत के मामलों पर प्रभाव

उन्होंने कहा कि सिर्फ इसलिए कि कोई आदेश गलत है, या फैसले में कोई गलती है, किसी न्यायिक अधिकारी को बिना किसी और वजह के विभागीय कार्रवाई की मुश्किल से नहीं गुजारा जाना चाहिए। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि ऐसी कार्रवाई का जिला न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर बुरा असर पड़ता है और अक्सर यह ट्रायल कोर्ट के जजों को विवेक का इस्तेमाल करने से हतोत्साहित करती है, खासकर जमानत के मामलों में। प्रशासनिक कार्रवाई के डर के कारण ट्रायल कोर्ट के जज सही मामलों में भी जमानत देने से हिचकिचा रहे हैं, जिससे हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जमानत अर्जियों की संख्या बहुत ज़्यादा बढ़ गई है।

निचली अदालतों के जजों के कार्यक्षेत्र का दबाव

हाई कोर्ट, जिसके पास सुपरवाइजरी कंट्रोल है, उसे यह ध्यान रखना चाहिए कि जिला न्यायपालिका के न्यायिक अधिकारी ज़्यादातर तनाव भरे माहौल में काम करते हैं। सिर्फ़ एक गलत आदेश या जमानत देने में विवेक का गलत इस्तेमाल, अपने आप में, बिना किसी और बात के, विभागीय कार्रवाई शुरू करने का आधार नहीं हो सकता। सुप्रीम कोर्ट ने कहा ऐसा नहीं होना चाहिए कि ट्रायल कोर्ट के जज के मन में किसी एडमिनिस्ट्रेटिव कार्रवाई के डर की वजह से, कानून के सिद्धांतों के अंदर आने वाले सही मामलों में भी बेल रिजेक्ट कर दी जाए। यही एक कारण है कि हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में बेल एप्लीकेशन की बाढ़ आ जाती है।

झूठी शिकायतें और बार की जवाबदेही

सुप्रीम कोर्ट ने ज्यूडिशियल अधिकारियों के खिलाफ झूठी और बेकार शिकायतों पर रोक लगाने के लिए भी कड़े निर्देश जारी किए। इसने कहा कि ऐसी शिकायतें करने वाले लोगों के खिलाफ कार्रवाई शुरू की जानी चाहिए। इसमें, उचित मामलों में, कोर्ट की अवमानना की कार्यवाही भी शामिल है। अगर शिकायत करने वाला बार का कोई ज़िद्दी सदस्य है, तो कोर्ट ने कहा कि अवमानना की कार्रवाई के अलावा, अनुशासनात्मक कार्यवाही के लिए बार काउंसिल को मामला भेजा जाना चाहिए। इसके साथ ही, कोर्ट ने यह भी साफ किया कि अगर किसी न्यायिक अधिकारी के खिलाफ दुर्व्यवहार की शिकायत पहली नजर में सच पाई जाती है, तो तुरंत अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की जानी चाहिए। न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ क्रिमिनल केस चलाना न्यायपालिका का नाम खराब करने वाले काले लोगों को बाहर निकालना है।

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