
नईदुनिया प्रतिनिधि, पन्ना। जिले में ऐतिहासिक और प्राकृतिक संरचनाएं बहुसंख्यक रूप में मौजूद हैं, लेकिन एक खास किला जिसका जिक्र देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने खास कार्यक्रम मन की बात में उल्लेखित किया था। जिसमें उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा था कि बुंदेलखंड में ऐसे कई किले हैं ग्वालियर, झांसी, अजयगढ़, दतिया; यह किले ईंट पत्थर नहीं हैं, यह हमारी संस्कृति के प्रतीक हैं। संस्कार और स्वाभिमान आज भी इन किलों की ऊंची-ऊंची दीवारों से झांकते हैं। मैं सभी देशवासियों से आग्रह करता हूं आप सभी इन किलों की यात्रा करें, अपने इतिहास को जानें और गौरव महसूस करें।
इस विषय पर जब देश के प्रधानमंत्री ने देशवासियों का ध्यान आकर्षण करवाया तो पर्यटकों की रुचि इन किलों को देखने के लिए बढ़ी, लेकिन दुर्भाग्य कहें या पन्ना जिले के अधिकारियों की उदासीनता, अजयगढ़ किले तक पहुंच मार्ग न होने के कारण और खड़ी चढ़ाई होने के कारण पर्यटक यहाँ नहीं पहुंच पा रहे हैं। लेकिन चौंकाने वाला सच यह भी है कि अजयगढ़ के किले के पहुंच मार्ग और वहां पर व्यवस्थाओं को सुनिश्चित करने के लिए 5 करोड़ रुपए स्वीकृत हो चुके हैं, लेकिन पन्ना टाइगर रिजर्व के बफर जोन में आने के कारण मंजूरी न मिल पाने के कारण पूरा कार्य शुरू नहीं हो पा रहा है।
सवाल यह खड़े होते हैं कि आखिर देश के प्रधानमंत्री जब इस विषय को लेकर इतने गंभीर हैं और मन की बात के माध्यम से पूरे देशवासियों से आग्रह कर रहे हैं, लेकिन किले तक पहुंचने को लेकर सड़क ही मौजूद नहीं है तो लोग कैसे किले तक पहुंचे? और जिले के अधिकारियों से यह सवाल भी बनता है कि आखिर मोदी की मन की बात क्यों अधिकारियों के मन तक नहीं पहुंच पा रही है? और वह जनप्रतिनिधि जो प्रधानमंत्री को अपना आदर्श मानकर विकास कार्यों के लिए हमेशा सजग रहते हैं, वह इस विषय पर क्यों नहीं कार्य कर पा रहे हैं?
पन्ना जिले की ऐतिहासिक धरोहरों में अजयगढ़ का किला (अजय पाल किला) एक बेशकीमती नगीना है। विंध्याचल की पहाड़ियों पर स्थित यह किला न केवल वास्तुकला का अद्भुत नमूना है, बल्कि चंदेल राजवंश के शौर्य और कलात्मकता की जीवंत कहानी भी कहता है। अजयगढ़ किला विंध्य की पहाड़ियों पर खुदा 'पत्थरों का इतिहास' बहुत ही पुराना है। मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड के पन्ना जिले में स्थित अजयगढ़ का किला इतिहास प्रेमियों और पर्यटकों के लिए कौतूहल का केंद्र है। समुद्र तल से लगभग 1,744 फीट की ऊंचाई पर स्थित यह दुर्ग अपनी अभेद्य घेराबंदी और नक्काशीदार मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है।
इस किले का गौरवशाली इतिहास चंदेल शासकों से जुड़ा है। माना जाता है कि चंदेल वंश के पतन के समय यह उनकी महत्वपूर्ण राजधानी रहा था। किले का नाम राजा अजय पाल के नाम पर रखा गया है, जिन्हें इस क्षेत्र के रक्षक के रूप में पूजा जाता है। अजयगढ़ का किला अपनी बारीक नक्काशी और पत्थरों पर उकेरी गई आकृतियों के लिए 'खजुराहो की परछाई' माना जाता है। किले में प्रवेश के लिए पांच मुख्य नक्काशीदार द्वार थे, जिनमें से अब कुछ ही सुरक्षित बचे हैं। किले के भीतर राजा अजय पाल को समर्पित एक प्राचीन मंदिर है, जहां मकर संक्रांति के दिन आज भी दो लाख से अधिक श्रद्धालु मत्था टेकते हैं।
किले के ऊपर दो प्रसिद्ध तालाब हैं, जिन्हें 'गंगा' और 'यमुना' कहा जाता है। पथरीली चोटी पर पानी के ये स्रोत उस समय के उन्नत जल प्रबंधन तंत्र को दर्शाते हैं। यहां जैन और हिंदू मंदिरों के खंडहरों में बिखरी हुई मूर्तियां पौराणिक कथाओं से सुसज्जित हैं। खड़ी पहाड़ियों पर स्थित होने के कारण इस किले को जीतना शत्रुओं के लिए लगभग असंभव था। किले के चारों ओर गहरी खाइयां और घने जंगल इसे प्राकृतिक सुरक्षा प्रदान करते हैं। वर्तमान में यह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के संरक्षण में है। पन्ना टाइगर रिजर्व के पास होने के कारण यहां पर्यटकों का आना-जाना लगा रहता है। हालांकि, किले तक पहुँचने के लिए लगभग 500 से अधिक सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं।
इस विषय को लेकर विभाग के अधिकारियों से चर्चा करूंगा, लेकिन जो भी भारत सरकार की नियमावली होगी उसके अनुरूप अगर मंजूरी दी जा सकती है या नही, यह देखना होगा। - नरेश यादव प्रभारी क्षेत्र संचालक, पन्ना टाइगर रिजर्व