
नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। मध्य प्रदेश में न्याय पाने की राह कितनी लंबी है, इसका अंदाजा हाई कोर्ट में लंबित मुकदमों के आंकड़ों से लगाया जा सकता है। प्रदेश की न्यायिक राजधानी जबलपुर स्थित प्रधान पीठ के साथ इंदौर और ग्वालियर की खंडपीठों में न्यायिक कामकाज का विस्तार तो है, लेकिन मुकदमों का बढ़ता बोझ व्यवस्था की क्षमता को लगातार चुनौती दे रहा है।
सितंबर 2026 के उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक हाई कोर्ट में कुल 4,94,451 प्रकरण लंबित हैं। इनमें 1,42,322 मामले ऐसे हैं, जो 10 वर्ष से अधिक समय से न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
यानी कुल लंबित मामलों का लगभग 29 प्रतिशत हिस्सा एक दशक से अधिक पुराना है। यह आंकड़ा बताता है कि मुकदमों का निपटारा केवल वर्तमान विवादों तक सीमित नहीं, बल्कि वर्षों से अटकी न्यायिक विरासत से भी जूझ रहा है।
53 में से 15 पद रिक्त, हर न्यायाधीश पर 13 हजार मुकदमे
हाई कोर्ट में न्यायाधीशों के 53 पद स्वीकृत हैं, लेकिन सितंबर 2026 में उपलब्ध स्थिति के अनुसार केवल 38 न्यायाधीश कार्यरत थे। इस तरह 15 पद रिक्त थे। अर्थात स्वीकृत न्यायिक क्षमता का लगभग 28.3 प्रतिशत हिस्सा उपलब्ध नहीं था।
लंबित प्रकरणों को कार्यरत न्यायाधीशों की संख्या से विभाजित करें तो प्रत्येक न्यायाधीश के हिस्से औसतन 13,012 मुकदमे आते हैं। हालांकि यह केवल सांख्यिकीय औसत है, वास्तविक कार्यभार पीठ और प्रकरणों की प्रकृति के अनुसार अलग-अलग होता है।
तीनों पीठों की जिम्मेदारी, लेकिन समाधान कितना प्रभावी
जबलपुर प्रधान पीठ के अलावा इंदौर और ग्वालियर खंडपीठ प्रदेश के अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों के मुकदमों की सुनवाई करती हैं। तीनों स्थानों पर न्यायिक अधोसंरचना, न्यायाधीशों और अधिवक्ताओं की उपलब्धता के साथ प्रकरणों के संस्थापन और निराकरण की गति महत्वपूर्ण है।
ऐसे में केवल कुल लंबित मामलों का आंकड़ा पर्याप्त नहीं है। तीनों पीठों के अलग-अलग लंबित प्रकरण, नए मामलों के दाखिले और निराकरण का तुलनात्मक विश्लेषण भी जरूरी है। इससे पता चलेगा कि किस क्षेत्र में मुकदमों का दबाव अधिक है और कहां निराकरण की गति बेहतर है।
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12 नामों की अनुशंसा से जगी उम्मीद
न्यायाधीशों की कमी दूर करने की दिशा में सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने 26 अक्टूबर को सात अधिवक्ताओं और 30 अक्टूबर को पांच न्यायिक अधिकारियों के नाम मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में न्यायाधीश नियुक्त करने के लिए अनुशंसित किए हैं। इस तरह कुल 12 नामों की अनुशंसा हुई है। हालांकि इनकी नियुक्ति अभी शेष संवैधानिक प्रक्रिया पूरी होने पर निर्भर है। सभी नियुक्तियां होने पर न्यायिक क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि संभव है।
सवाल केवल नियुक्तियों का नहीं
हाई कोर्ट में पुराने मुकदमों के निराकरण के लिए विशेष सुनवाई, प्रभावी केस मैनेजमेंट और प्राथमिकता निर्धारण जैसे उपायों की जरूरत है। जनवरी से जून 2025 के दौरान 546 जेल अपीलों का निराकरण किया गया, जिनमें 274 अपीलें पांच साल से अधिक पुरानी थीं।
यह बताता है कि लक्षित रणनीति से पुराने मामलों को आगे बढ़ाया जा सकता है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि तीन पीठों और बढ़ती न्यायिक क्षमता के बावजूद मुकदमों का पुराना बोझ किस रणनीति से घटेगा? क्योंकि न्याय का वास्तविक अर्थ केवल फैसला सुनाना नहीं, बल्कि समय पर फैसला सुनाना भी है।