
नईदुनिया प्रतिनिधि, खंडवा : देश के बारह ज्योतिर्लिंग में शामिल ओंकारेश्वर में दशहरे पर रावण का दहन नहीं होता है। जबकि मंगलवार को विजयादशमी पर देश भर में रावण के पुतले का दहन कर दशहरा मनाया जाएगा। तीर्थनगरी में दशहरे पर भगवान ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग की सवारी निकाल कर अस्तरे के पेड़ का पूजन कर दशहरा मनाया जाएगा।
मान्यता है कि ओंकारेश्वर के आसपास के 10 किलोमीटर क्षेत्र में रावण, कुंभकरण और मेघनाद के पुतलों का दहन नहीं किया जाता है। प्राचीनकाल से चली आ रही इस परंपरा का निर्वाहन सभी कर रहे है। ओंकारेश्वर मंदिर के प्रबंध ट्रस्टी राव पुष्पेंद्र सिंह का कहना है कि रावण भगवान शिव का अनन्य भक्त था। इसलिए भगवान शिव की इस नगरी में रावण के साथ ही कुंभकरण - मेघनाद के पुतले भी दशहरे पर नहीं बनाए जाते और न ही इनका दहन किया जाता है। यह परंपरा क्षेत्र में प्राचीन समय से चली आ रही है। यहां पर इस परंपरा को तोड़ना अशुभ माना जाता है।
ओंकारेश्वर मंदिर के आशीष दीक्षित ने बताया कि दशहरे पर मंगलवार शाम मंदिर परिसर में पूजापाठ व आरती के बाद भगवान ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग की सवारी निकलेगी। यह सवारी शिवपुरी के मुख्य बाजार से होती हुई खेड़ापति हनुमान मंदिर पहुंचेगी। जहां अस्तरे के पेड़ की पूजा के बाद राज परिवार के सदस्यों के साथ नगर की जनता राजमहल जाएगी। राजा राव पुष्पेंद्रसिंह नगरवासियों को प्रसाद स्वरूप श्रीफल भेंट करेंगे और पंडित - पुजारियों से आशीर्वाद प्राप्त करेंगे। बाद में नगर में दशहरा पर्व उत्साह से मनाया जाएगा। आशीष दीक्षित का कहना है कि रावण भगवान शिव का बहुत बड़ा भक्त था, जिसके चलते क्षेत्र में दशानन के प्रति आदर व सम्मान का भाव रहता है। रावण के पुतले के दहन से भगवान शिव के नाराज होने के भय के चलते यहां दशहरे पर निभाई जाने वाली यह परंपरा नहीं निभाते हैं।
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