
नईदुनिया प्रतिनिधि, खंडवा। सिंहस्थ में श्रद्धालुओं को ओंकारेश्वर से उज्जैन के लिए ट्रेन सुविधा का लाभ नहीं मिल सकेगा। इसके लिए सितंबर 2029 तक इंतजार करना पड़ेगा। वैसे इस ट्रैक के लिए वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए रेलवे बोर्ड ने 1500 करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया है। देखना ये है कि पश्चिम रेलवे और दक्षिण मध्य रेलवे इस वित्तीय वर्ष में इसको खर्च कर पाते हैं।
विदित हो कि वर्ष 2008 में रतलाम, महू, खंडवा, अकोला के बीच 472 किमी गेज कंवर्जन को केंद्रीय कैबिनेट से मंजूरी मिली थी, जिसे वर्ष 2013 में पूरा करना था। 18 वर्ष बीतने के बाद अभी भी लगभग 180 किमी गेज कन्वर्जन होना बाकी है। बहुप्रतीक्षित महू-खंडवा-अकोला गेज कनवर्जन का कार्य काफी पिछड़ चुका है। दो दशक से पश्चिम रेलवे और दक्षिण मध्य रेलवे अपने क्षेत्र में गेज कंवर्जन का कार्य कर रहे हैं। इस दौरान खंडवा से सनावद तक मेमू ट्रेन का संचालन हो रहा है।
वर्ष 2015 के बाद से इस रेल परियोजना को बजट में बड़ी राशि का आवंटन हो रहा है, लेकिन रेलवे इसे खर्च नहीं कर पा रहा है। वन विभाग की अनुमति और भूमि अधिग्रहण में देरी का हमेशा हवाला देकर इति श्री कर ली जाती है। ओंकारेश्वर में नर्मदा पुल तीन साल से बन रहा है। चोरल-पातालपानी के बीच तीन साल में टनल के टेंडर भी नहीं हो सके हैं। इधर दक्षिण मध्य रेलवे द्वारा तुकाईथड़ से अकोट के बीच बनने वाली सात किमी की टनल के टेंडर और टनल के काम शुरू करने की कोई गंभीरता नहीं दिख रही है।
ना ही खंडवा अमलाखुर्द के बीच ढाई साल पहले हुए सीआरएस के बाद अभी इसका विद्युतीकरण किया है। कुल मिलाकर रेलवे विभाग द्वारा भूमि अधिग्रहण और वन विभाग की अनुमति की आड़ लेकर बार बार कार्य पूरा करने की गाइड लाइन बदल कर इस गेज कन्वर्जन परियोजना को जल्द से पूरा करने में दिलचस्पी नहीं दिख रही है। मध्य रेल परामर्शदात्री समिति सदस्य मनोज सोनी का कहना है कि महू खंडवा अकोला गेज कंवर्जन कार्य में ढिलाई के कारण क्षेत्र की जनता रेल सुविधा से वंचित है। लोगों को तीन सौ किमी घूमकर यात्रा करने को मजबूर होना पड़ रहा है। परियोजना की लागत बढ़ रही है। रेलवे को भी राजस्व की हानि हो रही है।
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