
MP Halma Tradition: खंडवा (नईदुनिया प्रतिनिधि)। भाम और सुक्ता नदी के संगम पर बसे भामगढ़ गांव को बचाने के लिए 21 जनवरी को आयोजित हलमा अभियान से मिट्टी का क्षरण रुकने के साथ ही ग्राम पंचायत की आर्थिक स्थिति में सुधार होगा। नदी की बाढ़ से भूक्षरण रोकने के लिए दोनों नदियों के किनारों पर होने वाले विशेष प्रजाति के बांस के पौधरोपण से पर्यावरण में सुधार और तीन साल बाद इससे आय भी शुरू हो जाएगी। हजारों की संख्या में लगने वाले बांस के जंगल से ग्राम पंचायत लखपति ग्राम पंचायत हो जाएगी। परमार्थ की इस भीली परंपरा हलमा को निमाड़ के भामगढ़ गांव में शुरू करने का बीड़ा उठाने वाली गांव की बेटी और विषय विशेषज्ञ जनजातीय प्रकोष्ठ राजभवन भोपाल डा. दीपिका रावत ने पत्रकारों से चर्चा में बताया कि जनजाति वर्ग की हलमा परंपरा सही मायनों में सामूहिक श्रमदान का पर्याय है।
इससे समाज में आपसी सौहार्द के साथ ही जरूरत के समय एक-दूसरे के काम आने का भाव जागृत होता है। इससे असहाय व्यक्ति को मदद मिल जाती है। हलमा में शामिल होने वाले अपने संसाधनों से मदद करने पहुंचते हैं। समय के साथ झाबुआ क्षेत्र में हलमा संस्कृति विलुप्त होने लगी थी। 22 वर्ष पहले इस सामाजिक परंपरा का पुनर्जागरण पद्मश्री महेश शर्मा की शिवगंगा समग्र ग्राम विकास समिति परिषद ने उठाया था। इसके प्रयासों से झाबुआ क्षेत्र में जल, जमीन, पर्यावरण और संस्कृति के संरक्षण में कई उल्लेखनीय कार्य हुए है। हमारा सौभाग्य है कि भामगढ़ में 21 जनवरी को शिवगंगा के महेश शर्मा के सान्निध्य में हलमा की पहली बार शुरुआत होने जा रही है। इसमें जनप्रतिनिधि, सामाजिक संस्थाएं और आमजन सहभागी बनेंगे। हलमा अंतर्गत लगने वाले बांस से तीन साल बाद आय भी शुरू हो जाएगी। इस आय से क्षेत्र की महिला स्व सहायता समूह को 80 प्रतिशत और ग्राम पंचायत को 20 प्रतिशत राशि मिलेगी।
संत सिंगाजी की कर्मस्थली गौरवशाली गांव भामगढ़ के अस्तित्व को बचाने के लिए आमजन भी अपने 365 दिन के 8760 घंटे में से मात्र दो घंटे इस अभियान को देकर श्रमदान की नई मिसाल कायम कर सकते हैं। भामगढ़ स्टेट और सिंगाजी यहां डाकिया का कार्य करने का उल्लेख गजिटयर में भी है। ऐसे गांव के संरक्षण के लिए शासन के अलावा आमजन का सहयोग भी जरूरी है। प्रशासन और बांस मिशन की ओर से मनरेगा अंतर्गत पौधरोपण में मदद की जा रही है।