
नईदुनिया न्यूज, महेश्वर (खरगोन) : नर्मदा जब उफान पर थी, तब नगर के एक हिस्से को अपने साथ बहा ले गई थी। मकान ढहे व लोगों को अपना ठिकाना बदलना पड़ा, लेकिन नृसिंह टेकड़ी पर विराजित गणेशजी अपनी जगह अडिग रहे।
मंदिर का भवन भले ही बाढ़ की मार से टूट गया और छत ढह गई, मगर विघ्नहर्ता की प्रतिमा को आंच तक नहीं आई। यही वह घटना है जिसने नगर के बड़ा गणेश यानी बोर गणेश मंदिर की आस्था को एक अलग पहचान दी। देवी अहिल्याबाई होलकर के शासनकाल में गुजरात व अन्य क्षेत्रों से आए ब्राह्मण परिवारों ने नगर में भूमि लेकर अपनी धार्मिक परंपराएं स्थापित कीं।
इसी परंपरा से बड़ा गणेश मंदिर भी जुड़ा है। परिवार के अनुसार मंदिर की भूमि निजी थी और पूर्वजों ने मंदिर निर्माण करवाकर पूजा-सेवा की परंपरा शुरू की। बड़ा गणेश मंदिर इसलिए खास है, क्योंकि यहां गणेशजी लाभ और शुभ के साथ विराजित हैं।
करीब 204 वर्ष पहले वर्ष 1822 में आई भीषण नर्मदा बाढ़ ने नगर के लिंबाडिट क्षेत्र को बुरी तरह प्रभावित किया। बाढ़ के कारण नृसिंह टेकड़ी स्थित गणेश मंदिर का भवन व छत गिर गई, लेकिन प्रतिमा सुरक्षित रही। मंदिर की मरम्मत के लिए पूर्वजों ने तत्कालीन राजवाड़े को पत्र लिखा था।
पुराना राजकीय पत्र इस कहानी को दस्तावेजी आधार देता है, जिसमें भूमि को निजी बताते हुए राजवाड़े की ओर से मरम्मत कराने में असमर्थता जताई गई थी। समय के साथ मंदिर की भूमि को लेकर विवाद सामने आया। खासगी ट्रस्ट की ओर से दावेदारी किए जाने पर मामला न्यायालय पहुंचा।
परिवार ने पुराने दस्तावेज व राजकीय पत्र को आधार बनाया। इसके बाद श्री ऋषिकुमार विष्णुपंत जोशी के परिवार का मालिकाना हक स्वीकार किया गया। आज भी इसी परिवार के लोग मंदिर की पूजा-सेवा कर रहे हैं।
सहस्रधारा रोड स्थित बड़े गणेश मंदिर से रविवार सुबह आठ बजे अष्टविनायक दर्शन यात्रा का शुभारंभ होगा। श्रद्धालुओं से अथर्वशीर्ष की पोथी साथ लाने को कहा गया है। गणेश आराधना और अथर्वशीर्ष पाठ के साथ मंदिर से यात्रा प्रारंभ होगी।
यह भी पढ़ें- इंदौर के प्रसिद्ध खजराना मंदिर की बड़ी पहल, 20 लाख भक्तों की सुरक्षा के लिए किया 20 करोड़ का इंश्योरेंस