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गांधी जयंती : जहां विवाद थाने नहीं, चौपाल तक पहुंचते हैं, 'सीताराम' से शुरू होती है सुबह, मुकदमों से दूर खरगोन का गांव कठोरा

यहां आज भी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की विचारधारा प्रासंगिक है... जी हां हम बात कर रहे हैं जिले के एक छोटे से गांव की। नर्मदा के किनारे बसा कठोरा गांव...और पढ़ें

By Vivek ParasharEdited By: Ramnath Mutkule
Publish Date: Thu, 01 Oct 2026 05:30:14 PM (IST)Updated Date: Thu, 01 Oct 2026 06:49:07 PM (IST)
गांधी जयंती : जहां विवाद थाने नहीं, चौपाल तक पहुंचते हैं, 'सीताराम' से शुरू होती है सुबह, मुकदमों से दूर खरगोन का गांव कठोरा
खरगोन जिले में नर्मदा तट पर बसा कठोरा गांव। सौजन्य- ग्रामीण

HighLights

  1. आजादी के बाद से मुकदमों से दूर रहा गांव
  2. दो बार मिला 'विवादविहीन गांव' का सम्मान
  3. 1400 लगभग आबादी है कठोरा गांव की

विवेक पाराशर, नईदुनिया, खरगोन : यहां आज भी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की विचारधारा प्रासंगिक है... जी हां हम बात कर रहे हैं जिले के एक छोटे से गांव की। नर्मदा के किनारे बसा कठोरा गांव सिर्फ एक भौगोलिक पहचान नहीं, बल्कि सामाजिक सद्भाव और सामुदायिक निर्णय की ऐसी मिसाल है, जिसकी चर्चा देश के सर्वोच्च न्यायालय तक दो बार पहुंची है।

यहां विवाद होते हैं, मतभेद भी होते हैं, लेकिन उन्हें थाने और अदालत तक ले जाने के बजाय ग्रामीण अपनी चौपाल पर बैठकर सुलझा लेते हैं। यही परंपरा इस गांव को वर्षों से विवादविहीन बनाए हुए है। गांव को वर्ष 2002 में पहली बार विवादविहीन गांव का सम्मान मिला था। इसके 18 वर्ष बाद वर्ष 2020 में तत्कालीन भारत के मुख्य न्यायाधीश शरद अरविंद बोबडे ने ग्रामीणों से आनलाइन संवाद कर गांव को डिजिटल प्रमाण-पत्र प्रदान किया था।


गांव में मुख्य रूप से किसान और मजदूर वर्ग के लोग रहते हैं

गांव पटेल देवराम पटेल, रामसिंह यादव व कड़वा यादव बताते हैं कि कठोरा में सामाजिक संरचना की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यहां किसी विवाद को व्यक्ति या परिवार की प्रतिष्ठा का सवाल बनाने के बजाय सामुदायिक स्तर पर सुलझाने की कोशिश होती है। गांव में मुख्य रूप से किसान और मजदूर वर्ग के लोग रहते हैं।

दोनों वर्गों के लोग विवाद की स्थिति में चौपाल पर बैठते हैं

दोनों वर्गों के लोग विवाद की स्थिति में चौपाल पर बैठते हैं और बातचीत के जरिए समाधान तलाशते हैं। किसी एक पक्ष की जीत के बजाय संबंधों को बचाए रखना प्राथमिकता होती है। पारिवारिक या महिलाओं से जुड़े विवादों में गांव की महिलाएं स्वयं आगे आती हैं।

वे संबंधित परिवारों से बातचीत कर मामले को समझती हैं और आपसी सहमति से समाधान निकालने का प्रयास करती हैं। इस व्यवस्था ने कई छोटे विवादों को बड़ा रूप लेने से पहले ही रोकने में भूमिका निभाई है।

चौपाल पर होने वाली बातचीत, महिलाओं की भागीदारी, नर्मदा तट की आध्यात्मिकता और 'सीताराम' से शुरू होने वाला दिन, इन सबने मिलकर कठोरा को महज एक गांव नहीं, बल्कि सामाजिक सौहार्द की जीवंत परंपरा बना दिया है। छोटे-बड़े मामले गांव की चौपाल पर ही निपटाने की परंपरा आजादी के पूर्व से ही गांव के बुजुर्गों ने शुरू की थी। वर्तमान के युवा व बच्चे भी गांव की परंपरा को निभा रहे हैं।

एक गांव, दो बार मिला प्रमाण-पत्र

ग्राम के युवा पवन यादव ने बताया कि कठोरा की सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि विवादविहीन गांव का गौरव उसे एक बार नहीं, बल्कि दो बार मिला। वर्ष 2002 में गांव को यह पहचान मिली थी। इसके बाद भी ग्रामीणों ने अपनी सामाजिक परंपरा को बनाए रखा और वर्ष 2020 में गांव को दूसरी बार यह सम्मान मिला।

तत्कालीन सीजेआइ शरद अरविंद बोबडे ने आनलाइन ग्रामीणों से बातचीत कर उनके सामुदायिक विवाद निपटाने की व्यवस्था को जाना और डिजिटल प्रमाण-पत्र प्रदान किया।

न जुआ-सट्टा, न ताश की चौपाल, भजन-कीर्तन में मिलता है सुकून

कठोरा की सामाजिक संस्कृति की दूसरी खासियत यहां की जीवनशैली है। ग्रामीण जुआ, सट्टा और ताश जैसी गतिविधियों से दूरी बनाए रखने को अपनी सामुदायिक परंपरा का हिस्सा मानते हैं। नर्मदा किनारे बसे गांव में धार्मिक और आध्यात्मिक गतिविधियां लोगों के सामाजिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। शाम के समय मंदिरों में भजन-कीर्तन और सामूहिक धार्मिक आयोजन ग्रामीणों को एक साथ जोड़ते हैं।

क्या बच्चे, क्या बुजुर्ग सबका एक ही नाम 'सीताराम'

ग्राम के वरिष्ठ शेरू यादव, कैलाश यादव व सुखदेव यादव बताते हैं कि यहां अभिवादन भी केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि गांव की संस्कृति का हिस्सा है। ग्रामीणों के दिन की शुरुआत 'सीताराम' के नाम और एक-दूसरे को 'राम-राम' कहकर होती है। यहां बुजुर्ग, महिला-पुरुष व बच्चे भी एक-दूसरे से बात करते समय नाम के स्थान पर 'सीताराम' से ही संबोधित करते हैं। शायद यही वजह है कि कठोरा की चौपाल पर मतभेद के बावजूद मनभेद को स्थायी जगह नहीं मिलती।

संतश्री जीवित समाधि आस्था का केंद्र

कठोरा की पहचान केवल सामाजिक व्यवस्था तक सीमित नहीं है। गांव में संत श्रीश्री 1008 नानकदास जी महाराज ने करीब 400 साल पहले धर्म की ऐसी अलख जगाई, जो आज तक प्रकाशमान है। नर्मदा तट स्थित संतश्री की जीवित समाधि भी श्रद्धा का प्रमुख केंद्र है। प्रतिवर्ष यहां हनुमान जयंती पर विशाल भंडारे का आयोजन होता है। इस दिन गांव का कोई व्यक्ति विदेश में भी है, तो यहां पहुंचता है। नर्मदा तट, मंदिर और संत की समाधि गांव के सामाजिक जीवन में आध्यात्मिक आधार का काम करते हैं।

कठोरा को मॉडल गांव मान करेंगे काम

कठाेरा की आबादी लगभग 1400 है और करीब 700 मतदाता हैं। छोटे बड़े मामले गांव की चौपाल पर ही निपटाने की परंपरा आजादी के पूर्व से ही गांव के बुजुर्गों ने शुरू की थी। वर्तमान के युवा व बच्चे भी गांव की परंपरा को निभा रहे हैं। कठोरा को माडल गांव मान करेंगे कामजिले का कठोरा अपने आप में आदर्श ग्राम है। दाे बार विवादविहीन गांव का तमगा मिलना बड़ी बात है। हमारा प्रयास रहेगा कि कठोरा को मॉडल गांव मान कर जिले के अन्य ग्रामों को भी विवादविहीन बनाने की दिशा में काम किया जाए। -गुरु प्रसाद, कलेक्टर खरगोन

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