
नईदुनिया न्यूज, अरनोद। आमतौर पर युवा पढ़ाई पूरी कर अच्छी नौकरी, बड़ा पद और सफल करियर बनाने का सपना देखते हैं। चार्टर्ड अकाउंटेंट बनने के बाद तो किसी के लिए भी करियर की नई ऊंचाइयां छूने के रास्ते खुल जाते हैं लेकिन अंकित जैन ने सांसारिक उपलब्धियों के बजाय संयम और आत्म कल्याण का मार्ग चुना। सातवीं कक्षा में अध्ययन करते समय ही मुनि बनने की भावना जग गई थी।
कई बार प्रयास करने के बावजूद जब संकल्प पूरा नहीं हो सका तो पढ़ाई जारी रखी। प्रतापगढ़ से बीकॉम कर इंदौर में सीए की पढ़ाई पूरी की। आखिरकार सीए बनने के बाद सांसारिक जीवन छोड़कर जैन दीक्षा लेने का निर्णय किया। अब 25 अक्टूबर को दिल्ली के लाल किले में दीक्षा ग्रहण करेंगे।
दीक्षा से पहले चल रहे कार्यक्रम के दौरान बातचीत में अंकित जैन ने कहा कि दीक्षा केवल सांसारिक जीवन का त्याग नहीं, बल्कि मनुष्य जन्म को सार्थक करने और आत्म कल्याण की दिशा में आगे बढ़ने का संकल्प है।
बचपन से ही मन में मुनि बनने की भावना थी। 7वीं कक्षा में पढ़ते समय पहली बार यह भाव मन में आया था। 11वीं कक्षा में भी संयम मार्ग पर बढ़ने के लिए पुरुषार्थ किया था लेकिन उस समय संयोग नहीं बना तो प्रतापगढ़ से बीकॉम करने के बाद इंदौर में सीए की पढ़ाई शुरू की।
सीए फाइनल परीक्षा की तैयारी कर रहे थे तभी कोरोना आ गया। इस दौरान फिर से वैराग्य जाग्रत हुआ और दीक्षा लेने की भावना प्रबल हुई। पर उस समय भी संकल्प पूरा नहीं हो सका। आखिरकार चार्टर्ड अकाउंटेंट बनने के बाद संयम मार्ग अपनाने का निर्णय लिया।
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एक समय ऐसा भी आया जब लगा कि संसार में रहकर जीवन बिताना चाहिए। जब आचार्य भगवंत विशुद्धसागरजी के दर्शन करने पहुंचे, तो मन में अलग ही भाव जागृत हुआ। 25 अक्टूबर को दिल्ली के लाल किले में दीक्षा ग्रहण करते समय मन में यही प्रमुख भाव रहेगा कि मनुष्य जन्म को सार्थक बनाना है।
मेरी भावना यही रहेगी कि कम से कम भवों में आत्म कल्याण के अंतिम लक्ष्य को प्राप्त कर सकें। दीक्षा केवल घर-परिवार छोड़ना नहीं, बल्कि आत्मा के वास्तविक स्वरूप को पहचानकर मोक्ष मार्ग पर चलने का संकल्प है।