
नईदुनिया प्रतिनिधि, मंदसौर : भारत में केवल दो ही जगह ऐसी है जहां शिव पंचायत में धन के देवता कुबेर भी विराजित है। इसमें पहला कैदारनाथ धाम है और दूसरा मंदसौर। मंदसौर के खिलचीपुरा क्षेत्र में श्री धौलागढ़ महादेव मंदिर में शिव पंचायत के साथ भगवान कुबेर भी विराजित है।
मंदसौर वह जगह है जहां रावण को दामाद माना जाता है और उनके सौतेले भाई धन के देवता कुबेर को भी पूजा जा रहा है। मंदिर में धन तेरस पर 6 नवंबर को अल सुबह से ही माथा टेकने बड़े-बड़े नेता, प्रभावशाली लोग और अफसर भी आएंगे।
धन तेरस पर 6 नवंबर को अलसुबह से ही श्रद्धालु श्री धौलागढ़ महादेव मंदिर पहुंचना शुरू हो गए। ब्रह्म मुहुर्त से आने वाले श्रद्धालुओं का तांता आधी रात तक लगा रहेगा। देर रात को हवन की पूर्णाहुति होगी। वहीं विशेष अनुष्ठान भी होंगे।
मंदसौर शहर में विश्वविख्यात श्री पशुपतिनाथ महादेव मंदिर से महज एक किमी दूरी स्थित खिलचीपुरा में लगभग 1200 वर्ष पुराने धौलागढ़ महादेव मंदिर में भगवान कुबेर की प्रतिमा के दर्शनों के लिए अल सुबह करीब चार बजे से ही भक्त पहुंचने लगे।
यहां सुबह चार बजे से विशेष अनुष्ठान के तहत महाभिषेक, हवन व पूजन प्रारंभ होगा। अभिषेक के बाद भगवान का आकर्षक श्रृंगार किया जाएगा। इसके बाद हवन प्रारंभ होगा। दर्शन करने के लिए भक्तों की कतारे लगेगी।
उल्लेखनीय है कि खिलचीपुरा में श्री धौलागढ़ महादेव मंदिर पर शिव के साथ ही कुबेर की मूर्ति भी है। विश्व में दो ही स्थान ऐसे हैं जहां शिव पंचायत में कुबेर भी शामिल है। एक चार धामों में शामिल श्री कैदारनाथ में तथा दूसरी मूर्ति धौलागढ़ महादेव मंदिर में हैं।
पुरातत्व विभाग के डॉ. कैलाश शर्मा के अनुसार श्री धौलागढ़ महादेव मंदिर लगभग 1200 साल पहले बना है। इसी मंदिर में स्थापित भगवान कुबेर की मूर्ति उत्तर गुप्तकाल में सातवीं शताब्दी में निर्मित है। मराठाकाल में धोलागिरी महादेव मंदिर के निर्माण के दौरान इसे गर्भगृह में स्थापित किया गया था।
मंदिर में भगवान गणेश व माता पार्वती की मूर्तियां भी है। 1978 में श्री कुबेर की मूर्ति की पहचान हुई। मूर्ति में कुबेर बड़े पेट वाले, चतुर्भुजाधारी सीधे हाथ में धन की थैली और तो दूसरे में प्याला धारण किए हुए है। नेवले पर सवार इस मूर्ति की ऊंचाई लगभग तीन फीट है।
प्राचीन व पुरा महत्व का मंदिर होने से इसकी संरचना में बदलाव नहीं किया जा सकता। ऐसी मान्यता है कि यह मंदिर गुप्तकालीन है और यहां पर उड़ कर आया था। इस मंदिर की कोई नींव नहीं है। मराठा काल में इस मंदिर का जीर्णोद्धार हुआ था।
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