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मंदसौर-नीमच के वीरान गांवों में बन रही एमडी ड्रग, इससे सेक्स पावर बढ़ाने का दावा कर लोगों को फांस रहे तस्कर

मध्य प्रदेश के नीमच और मंदसौर जिलों के गांवों कभी डोडाचूरा और अफीम को लेकर पहचाने जाते थे, लेकिन अब यहां सिंथेटिक ड्रग की फैक्ट्रियां खुल गई हैं। पहले...और पढ़ें

By Digital DeskEdited By: Prashant Pandey
Publish Date: Thu, 05 Feb 2026 01:29:53 PM (IST)Updated Date: Thu, 05 Feb 2026 01:48:51 PM (IST)
मंदसौर-नीमच के वीरान गांवों में बन रही एमडी ड्रग, इससे सेक्स पावर बढ़ाने का दावा कर लोगों को फांस रहे तस्कर
एमडी का उत्पादन गांवों के वीरान और निर्जन इलाकों में किया जाता है, जहां निगरानी कम रहती है। - प्रतीकात्मक तस्वीर

HighLights

  1. 10 लाख रुपये प्रति किलो तक पहुंच जाती है काले बाजार में एमडी की कीमत
  2. 30 से 40 हजार रुपये की लागत में एक किलो एमडी हो जाती है तैयार
  3. डूब क्षेत्र से श्रमिक बस्तियों तक सप्लाई चेन, अफीम नेटवर्क ने बदला कारोबार

नईदुनिया प्रतिनिधि. मंदसौर/नीमच। अफीम और डोडाचूरा के लिए पहचाने जाने वाले नीमच–मंदसौर क्षेत्र की पहचान अब तेजी से बदल रही है। पुलिस और नारकोटिक्स एजेंसियों की हालिया कार्रवाइयों से यह खुलासा हुआ है कि सिंथेटिक ड्रग एमडी (मेथीलीनडायआक्सी मेथामफेटामीन) का अवैध उत्पादन अब दूरस्थ और वीरान ग्रामीण इलाकों में किया जा रहा है और इसे सुनियोजित सप्लाई चैन के जरिए शहरी क्षेत्रों की श्रमिक बस्तियों व बड़े शहरों तक पहुंचाया जा रहा है।

इस बदलाव ने नशे के कारोबार की तस्वीर ही बदल दी है, जहां खेतों से निकलने वाली अफीम की जगह अब केमिकल से बनी ड्रग ले चुकी है। सप्लाई नेटवर्क तैयार, अफीम से एमडी की ओर शिफ्ट अब तक जिले की पहचान देश में अफीम उत्पादक क्षेत्र के रूप में थी। तस्करों की दुनिया में इसे अफीम और डोडाचूरा का गढ़ माना जाता था, लेकिन बीते एक-दो वर्षों में यहां सिंथेटिक ड्रग एमडी का अवैध कारोबार तेजी से बढ़ा है।


पांच आरोपी पकड़े गए

मप्र पुलिस की नारकोटिक्स विंग इंदौर की विशेष टीम ने जिला मुख्यालय से दूर गांधी सागर के डूब क्षेत्र में लसूड़िया इस्तमुरार गांव में एमडी बनाने की फैक्ट्री पकड़ी। इसके बाद मनासा विकासखंड के ग्राम खेड़ी दायमा में दबिश देकर एमडी और इसे बनाने का रासायनिक माल जब्त किया गया। इन दोनों मामलों में पांच आरोपित पकड़े गए, जबकि एक फरार हो गया।

इसी दौरान नीमच कैंट और सिटी पुलिस ने दो अलग-अलग प्रकरणों में श्रमिक बस्तियों के युवकों को एमडी की गोलियां बेचते हुए गिरफ्तार किया। जांच में सामने आया कि एमडी का उत्पादन गांवों के वीरान और निर्जन इलाकों में किया जाता है, जहां निगरानी कम रहती है। वहां से इसे छोटे-छोटे कैरियर और पैडलर के माध्यम से शहरों तक पहुंचाया जाता है।

बड़े शहरों तक पहुंचा रहा

इस तरह गांव से शहर तक एक संगठित सप्लाई चैन बन चुकी है। विशेषज्ञों के अनुसार, पहले जो नेटवर्क अफीम, डोडाचूरा और गांजा की तस्करी करता था, वही अब एमडी के कारोबार में शिफ्ट हो चुका है। यही नेटवर्क एमडी को नीमच–मंदसौर से मध्य प्रदेश और राजस्थान के बड़े शहरों तक पहुंचा रहा है। इससे अवैध निर्माता, सप्लायर और पैडलर लाखों रुपये कमा रहे हैं।

गंध नहीं, प्रचार ज्यादा युवाओं को फांसने की नई रणनीति

मंदसौर और आसपास के क्षेत्रों में युवाओं में एमडी तेजी से फैलने का एक बड़ा कारण यह है कि इसमें किसी तरह की तेज गंध नहीं आती। नशा कर घर लौटने पर स्वजन को इसका अंदाजा नहीं लग पाता। तस्करों ने इस ड्रग को लेकर यह दुष्प्रचार भी किया है कि इससे तनाव कम होता है और सेक्स पावर बढ़ती है। इसी भ्रम में पढ़ाई करने वाले युवा भी इसकी चपेट में आ रहे हैं। काले बाजार में एमडी की कीमत 10 लाख रुपये प्रति किलो तक पहुंच जाती है।

यही कारण है कि इसके खरीदार सामान्यत

बड़े शहरों के अमीर और उच्च मध्यमवर्गीय युवाओं की पार्टियों में मिलते हैं। पुलिस और एजेंसियों के अनुसार, महज 30 से 40 हजार रुपये की लागत में एक किलो एमडी तैयार हो जाती है, जिसे लाखों में बेचा जाता है। बीच के कैरियर और पैडलर को भी 10–20 हजार रुपये देने के बाद अच्छी-खासी रकम बच जाती है।

यह भी पढ़ें : ड्रग्स सप्लाई में लिप्त हिंदू युवतियों का शोषण करते थे मुस्लिम तस्कर, फार्म हाउस पर हुई थी पार्टी

खेती से केमिस्ट्री तक : नशे का नया रास्ता, मुनाफे का खतरनाक खेल

  • नीमच-मंदसौर क्षेत्र में एमडी के बढ़ते उत्पादन और सप्लाई चैन ने यह साफ कर दिया है कि नशे का कारोबार अब खेती से निकलकर केमिस्ट्री लैब तक पहुंच चुका है। अगर समय रहते इस नेटवर्क को तोड़ा नहीं गया, तो गांवों में बनने वाली यह ‘केमिकल मौत’ शहरों की युवा पीढ़ी को तेजी से अपनी गिरफ्त में ले लेगी और ये तबाही के कगार पर पहुंच जाएगी।

  • पुलिस, नारकोटिक्स विंग, केंद्रीय नारकोटिक्स ब्यूरो और नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो लगातार कार्रवाई कर रही हैं। तस्करी से अर्जित संपत्तियों को सफेमा एक्ट के तहत जब्त किया जा रहा है और आरोपितों को पीआईटी-एनडीपीएस एक्ट में जेल भेजा जा रहा है। बावजूद इसके, कम समय में होने वाली मोटी कमाई युवाओं को इस अवैध धंधे की ओर खींच रही है।
  • यह ड्रग पूरी तरह रासायनिक है, इसलिए स्मैक या हेरोइन की तरह अफीम की फसल पर निर्भर नहीं है। यही वजह है कि पहले अफीम से स्मैक और हेरोइन बनाने वाले कई तस्कर अब एमडी बनाने की ओर मुड़ गए हैं। इंदौर, मुंबई, हैदराबाद, जयपुर, रायपुर, अहमदाबाद, सूरत, पुणे, बेंगलुरु, दिल्ली और कोलकाता जैसे महानगरों में इसके खरीदार आसानी से मिल जाते हैं।