
नईदुनिया प्रतिनिधि, पन्ना । केन-बेतवा लिंक, मझगाय, रुंझ बांध और सिंगरौली-ललितपुर रेलवे लाइन से प्रभावित विस्थापितों का चिता आंदोलन चौथे दिन भी जारी रहा। भीषण गर्मी में प्रभावित परिवार पानी में चिताओं पर लेटकर विरोध दर्ज करा रहे हैं। आंदोलन में बड़ी संख्या में आदिवासी महिलाएं अपने बच्चों के साथ शामिल हुईं।
भटनागर ने कहा कि जब प्रभावितों ने धरना दिया तो धारा 144 और अब धारा 163 लगाकर आंदोलन को दबाने की कोशिश की गई, मुकदमे दर्ज किए गए। आज स्थिति यह है कि कई परिवारों को मुआवजा मिले बिना ही उनके घर पानी में डूब रहे हैं, कई घर गिर रहे हैं। पुलिसिया दमन से घरों को बुलडोज किया जा रहा है।
आंदोलनकारियों के अनुसार पहले पुनर्वास पैकेज 5 लाख था, जुलाई के आंदोलन के बाद मुख्यमंत्री ने कैबिनेट में 12.50 लाख के पैकेज की घोषणा की थी। आरोप है कि कई परिवारों को आज तक 5 लाख की राशि भी नहीं मिली। सिंचित भूमि को रिकॉर्ड में असिंचित दिखाकर मुआवजा कम करने के आरोप भी लगाए गए।
आंदोलन का नेतृत्व कर रहे जय किसान संगठन के नेता अमित भटनागर ने कहा कि प्रभावितों ने कभी विकास का विरोध नहीं किया, केवल ग्रामसभा, पारदर्शिता और उचित पुनर्वास की मांग की थी। आरोप है कि बिना कानून का पालन किए ही उनकी जमीनों पर कार्रवाई की गई।
भटनागर ने कहा, "यह केवल मुआवजे का सवाल नहीं, संविधान, जीवन और गरिमा का सवाल है। सरकार काम आगे बढ़ा रही है और हमारे घर डूब रहे हैं।
इस आंदोलन में मझगाय, रुंझ, केन-बेतवा और रेलवे लाइन के प्रभावित एक साथ आए हैं। प्रभावितों ने कहा कि परियोजनाएं अलग हैं, पर पीड़ा एक जैसी है। महिला आंदोलनकारी दिव्या अहिरवार और हिसाबी राजपूत ने कहा कि हम बच्चों के साथ इसलिए बैठी हैं क्योंकि सुनने वाला कोई नहीं है।
भटनागर ने कहा कि आंदोलन का नारा न्याय दो या मार दो बेबसी को दर्शाता है। हम मौत नहीं, न्याय मांग रहे हैं। बिजली-पानी रोककर आवाज नहीं दबाई जा सकती। उन्होंने मांग की कि डूब क्षेत्र के हर परिवार का सत्यापन कर लंबित मुआवजा, मकान और जमीन का उचित मूल्यांकन और घोषित 12.50 लाख का पैकेज तुरंत दिया जाए। जब तक न्याय नहीं मिलेगा, चिता आंदोलन जारी रहेगा।
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