
नईदुनिया प्रतिनिधि, रतलाम। रूढ़िवादिता और सदियों पुरानी परंपराओं को पीछे छोड़कर मानवता की सेवा का नया अध्याय लिखने वाला रतलाम अब देहदान के क्षेत्र में प्रदेश ही नहीं, देश के लिए भी मिसाल बन रहा है। वर्ष 2018 में शासकीय मेडिकल कालेज की शुरुआत के बाद से जिले में देहदान और नेत्रदान के प्रति जागरूकता लगातार बढ़ी है।
डॉ. लक्ष्मीनारायण पांडेय शासकीय मेडिकल कॉलेज को अब तक 51 देह प्राप्त हो चुकी हैं। इनमें 33 पुरुष और 18 महिलाओं की देह शामिल हैं। इसके अलावा जिले से दो-दो देह शासकीय मेडिकल कालेज मंदसौर और नीमच को भी दी गई हैं। इंदौर, देवास, दाहोद, मंदसौर, नीमच सहित आसपास के अन्य शासकीय और निजी मेडिकल कालेज भी रतलाम से देह की मांग कर रहे हैं।
रतलाम में देहदान अभियान को सबसे बड़ा मोड़ 77 वर्षीय सुशीला दिवेकर के निधन के बाद मिला। उनके पुत्र डॉ. रवि दिवेकर और परिवार ने परंपराओं से अलग निर्णय लेते हुए सुशीला दिवेकर का नेत्रदान कराने के साथ ही रतलाम मेडिकल कालेज का पहला देहदान कराया। इस ऐतिहासिक पहल को शासन और पुलिस प्रशासन ने भी सम्मान दिया। दिवंगत सुशीला दिवेकर को गार्ड आफ आनर के साथ अंतिम विदाई दी गई। किसी देहदानी को पुलिस द्वारा गार्ड ऑफ आनर दिए जाने का यह रतलाम में पहला मामला था। इससे समाज में देहदान के प्रति सम्मान और जागरूकता को नई दिशा मिली।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव सरकार द्वारा देहदान करने वालों को राजकीय सम्मान देने का निर्णय लिए जाने के बाद इस अभियान को और गति मिली। विरियाखेड़ी वृद्धाश्रम में रहने वाले 72 वर्षीय ओमप्रकाश सोलंकी के निधन के बाद उनका देहदान भी राजकीय सम्मान के साथ किया गया। रेलवे से सेवानिवृत्त लेखक 82 वर्षीय कृष्णपाल छप्री और लंबी बीमारी से जूझ रहे 43 वर्षीय हितेश टटावत ने भी चिकित्सा शिक्षा के लिए देहदान कर समाज के सामने उदाहरण प्रस्तुत किया।
देहदान की मुहिम केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं रही। 30 वर्षीय आशीष देवड़ा ने अपने जन्मदिन पर मेडिकल कालेज में ही केक काटकर मृत्यु के बाद देहदान का संकल्प फार्म भरा। उनका यह कदम युवाओं के लिए भी प्रेरणादायी बना।
देहदान के लिए डॉ. लक्ष्मीनारायण पांडेय शासकीय मेडिकल कालेज के साथ काकानी सोशल वेलफेयर फाउंडेशन और नेत्रम जैसी संस्थाएं लगातार जागरूकता अभियान चला रही हैं। इसके परिणामस्वरूप अब तक 700 नागरिक जीवित रहते हुए मृत्यु के बाद देहदान के लिए एडवांस रजिस्ट्रेशन करा चुके हैं। मेडिकल छात्रों के लिए भी यह अभियान किसी वरदान से कम नहीं है।
एमबीबीएस विद्यार्थियों को शरीर रचना विज्ञान की पढ़ाई में वास्तविक मानव शरीर के अध्ययन की आवश्यकता होती है। पहले मेडिकल कालेजों में कैडेवर की कमी बड़ी चुनौती रहती थी, लेकिन रतलाम के नागरिकों की जागरूकता ने एनाटामी की पढ़ाई, व्यावहारिक प्रशिक्षण और शोध के लिए उपलब्धता बढ़ाई है।
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काकानी सोशल वेलफेयर फाउंडेशन के गोविंद काकानी के अनुसार देहदान के प्रति जागरूकता लगातार बढ़ रही है। वर्ष 2016 से पहले पूरे प्रदेश में एक साल में करीब 50 से 60 देहदान होते थे, जबकि अब यह संख्या बढ़कर लगभग 300 से 400 हो गई है। मध्य प्रदेश में देहदान के मामले में इंदौर 50 से अधिक वार्षिक देहदान के साथ पहले स्थान पर है, जबकि रतलाम 8 से 10 वार्षिक देहदान के साथ दूसरे पायदान पर पहुंच गया है।
कोरोना काल में भी कई लोगों ने देहदान के लिए आगे आकर संकल्प निभाने की इच्छा जताई, लेकिन संक्रमण फैलने के खतरे के कारण उस समय कई देह स्वीकार नहीं की जा सकीं। इसके बावजूद जागरूकता और सामाजिक सहयोग का सिलसिला जारी है। लगातार बढ़ते आंकड़े संकेत दे रहे हैं कि रतलाम आने वाले समय में देहदान के क्षेत्र में प्रदेश में नंबर वन बनने की दौड़ में मजबूती से शामिल हो सकता है।