
नईदुनिया प्रतिनिधि, रतलाम : सुप्रीम कोर्ट ने छह साल की बच्ची से दुष्कर्म और हत्या के मामले में दोषी के मृत्युदंड को उम्रकैद में बदलते हुए इस सजा में सुधार की संभावना को लेकर महत्वपूर्ण कसौटी तय की है।
मध्य प्रदेश के रतलाम जिले के जावरा के इस मामले में न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की पीठ ने कहा कि किसी दोषी को फांसी देने के लिए केवल अपराध की गंभीरता पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना होगा कि क्या उसके सुधार की संभावना खत्म हो चुकी है।
यदि दोषी के बाकी जीवन को जेल में रखने वाली सजा अपराध के लिए पर्याप्त है और उसके सुधार की संभावना को नकारा नहीं जा सकता, तो फांसी नहीं दी जा सकती। पीठ ने अपने निर्णय में कहा कि इस मामले में अपराध बेहद गंभीर था लेकिन राज्य यह साबित नहीं कर सका कि दोषी में सुधार की कोई संभावना नहीं बची है।
कोर्ट ने मृत्युदंड की सजा बदलकर दोषी को उसके जीवन के शेष समय तक जेल में रखने का आदेश दिया। किसी तरह की माफी या समयावधि में कमी का लाभ नहीं मिलेगा। अपराधी की परिस्थितियां भी देखना जरूरी सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मृत्युदंड तय करते समय कोर्ट को केवल यह नहीं देखना चाहिए कि अपराध कितना भयावह है।
अपराधी की उम्र, पारिवारिक और सामाजिक परिस्थितियां, जेल में उसका व्यवहार और उसमें सुधार की संभावना जैसे पहलुओं को भी तौलना होगा। बता दें, जावरा की विशेष अदालत ने दिसंबर, 2018 में 56 वर्षीय वारिस को दोषी पाते हुए फांसी की सजा सुनाई थी। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने नवंबर, 2019 में इसे बरकरार रखा।
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