सागर से अतुल तिवारी। बुंदेलखंड में कई किले भारत के स्वाधीनता संग्राम के साक्षी रहे हैं। इसमें से एक है राहतगढ़ का किला। सन् 1857 के विद्रोह के बाद जब ब्रिटिश अधिकारी ह्यूरोज सेना लेकर झांसी की ओर बढ़ रहा था। तब उसका सामना बुंदेलखंड के योद्धाओं से हुआ। शाहगढ़, बानपुर के जवानों ने ह्यूरोज के सैनिकों को कड़ी टक्कर दी। गढ़ाकोटा व सागर पर अधिकार करने के बाद ह्यूरोज का लक्ष्य राहतगढ़ का किला था। ह्यूरोज, अन्य अधिकारियों हैमिल्टन व पेंडर गोस्ट की टुकड़ियों के साथ जबलपुर से गढ़ाकोटा आया। यहां दो दिन रुककर सैनिक राहतगढ़ की ओर बढ़ा दिए।

इतिहासकार बाबूलाल द्विवेदी द्वारा संपादित पुस्तक 'बानपुर और बुंदेलखंड' व गजेटियर के मुताबिक ब्रिटिश सेना ने रात में ही राहतगढ़ दुर्ग को चारों ओर से घेर लिया और सुबह होते ही दुर्ग पर गोलाबारी शुरू कर दी। किले में सागर की 49वीं पैदल सेना के विद्रोही सैनिक थे। वे सहायता के लिए शाहगढ़, बानपुर और राजा मर्दन सिंह को पहले ही मदद के लिए पत्र लिख चुके थे। दुर्ग की सुरक्षा की विद्रोही सैनिकों ने कोई व्यवस्था नहीं की थी। इस वजह से वे किले में घिरकर रह गए। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि विद्रोही सेना में एक भी अधिनायक ऐसा नहीं था, जो युद्ध की सभी विधाओं से भली-भांति परिचित हो।

इसके बावजूद राहतगढ़ के किले से विद्रोही सैनिकों ने ब्रिटिश सेना की गोलाबारी का पूरा जवाब दिया। इसी बीच, राहतगढ़ दुर्ग में घिरे सैनिकों का पत्र मिलते ही शाहगढ़ व बानपुर की संयुक्त सेनाएं भी राहतगढ़ की ओर कूच कर चुकी थीं। सुबह से तीन घंटे ही युद्ध चल पाया कि राहतगढ़ पर घेरा डालने वाली ब्रिटिश सेना ने खुद को घिरा हुआ पाया। जवाहर सिंह, हिम्मत सिंह, मलखान सिंह जालंधर वालों ने ब्रिटिश सेना पर चारों ओर से घेरा डालकर हमला शुरू कर दिया था।

एक- एक विद्रोही सैनिक को दुर्ग से निकाला था बाहर : संयुक्त सेनाओं से युद्ध इतना लंबा चला कि अंत में गोलियों का स्थान सांगों और भालों ने ले लिया। हिम्मत सिंह की टुकड़ी को सफलता मिली। वे किले में घिरे एक-एक सैनिक को निकालने में सफल रहे। अंतत: दुर्ग पर अंग्रेजों का कब्जा हो गया।

दोतरफा मार से घबरा उठा था ह्यूरोज

ब्रिटिश सैनिकों को इस घेरे का तब पता चला जब उनकी पीठ पर गोलियां चलने लगीं। ह्यूरोज कुछ क्षणों के लिए इस दोतरफा मार से घबरा उठा। लेकिन उसने तुंरत आधी सेना का रुख बाहर से घेरा डालने वाली शत्रु सेना की ओर कर दिया। मर्दन सिंह और बखतबली की सेनाएं ब्रिटिश सेना के प्रतिरोध की परवाह न करके शत्रु सेना की ओर बढ़ने लगीं। हिम्मत सिंह अपने चुने हुए साथियों के साथ आगे बढ़े और किले के मुख्य द्वार की ओर ब्रिटिश सेना को हटाते हुए मार्ग बनाने लगे।

विशाल व भव्य है किला

सागर जिले में स्थित राहतगढ़ में बीना नदी के किनारे पहाड़ी पर यह एक विशाल व भव्य किला है। महाराजा संग्राम शाह के पूर्व यहां पर चंदेल और परमार शासकों ने शासन किया। महारानी दुर्गावती एवं वीरनारायण की मृत्यु के बाद उनके उत्तराधिकारी राजा चंद्रशाह को गोंडवाना साम्राज्य का राजा बनाने के लिए अकबर को जो दुर्ग देने पड़े उनमें से एक राहतगढ़ किला भी था। इस किले की बनावट सुरक्षा की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। किले की बाहरी दीवारों के साथ सुरक्षा चौकियों के अवशेष भी दिखाई देते हैं। पहाड़ी बहुत ऊंची है और किले की बनावट ऐसी है कि आक्रमणकारियों पर दूर से ही निशाना लगाया जा सकता है। किला ऊंची चहारदीवारी से घिरा है जिसमें सुरक्षा चौकियां बनी हैं। किले के दक्षिण किनारा बीना नदी की खाई से लगा हुआ है। इस खाई से होकर किले में प्रवेश कर पाना असंभव सा है।

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