
शिवम कृष्ण त्रिपाठी, नईदुनिया, सतना। मोबाइल में फोटो, वीडियो और दस्तावेज रखने से लेकर अस्पतालों में मरीजों का रिकार्ड, बैंकों में खातों की जानकारी और कंपनियों का महत्वपूर्ण डेटा इंटरनेट के जरिए क्लाउड पर सुरक्षित रखा जा रहा है। ऐसे में लोग अपना डेटा जरूरत पड़ने पर कहीं से भी इस्तेमाल करते हैं।
क्लाउड व्यवस्था को साइबर हमलों से सुरक्षित रखने के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआइ) और मशीन लर्निंग आधारित क्लाउड सिक्योरिटी डिटेक्टिंग डिवाइस की अवधारणा विकसित की गई है।
इस तकनीकी को जगद्गुरु रामभद्राचार्य दिव्यांग राज्य विश्वविद्यालय, चित्रकूट के डाॅ. अमित अग्निहोत्री, महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय के डाॅ. देवरस पांडे और डाॅ. गौरी शंकर कुशवाहा, आईआईटी बिहटा के शुभम कुमार सहित अन्य शोधकर्ताओं ने विकसित किया है।
मान लीजिए किसी अस्पताल के कंप्यूटर में मरीजों की जांच रिपोर्ट सीधे उसी कंप्यूटर में रखने के बजाय इंटरनेट के जरिए एक बड़े डेटा सेंटर में सुरक्षित रखी जाती है तो डाक्टर अधिकृत लागिन से कहीं से भी रिपोर्ट देख सकते हैं। इसका फायदा यह होता है कि डेटा को अलग-अलग कंप्यूटरों में रखने की जरूरत कम होती है।
अधिकृत व्यक्ति इंटरनेट के जरिए उसे इस्तेमाल कर सकते हैं, लेकिन इसके साथ खतरा भी है। यदि कोई साइबर अपराधी चोरी किए गए पासवर्ड से सिस्टम में घुसने की कोशिश करे, तो बड़ी मात्रा में डेटा अचानक बाहर भेजा जाए या किसी खाते से असामान्य समय पर लगातार लागिन किए जाएं तो यह सुरक्षा के लिए खतरे का संकेत हो सकता है।
प्रस्तावित प्रणाली का महत्वपूर्ण हिस्सा यह है कि यह क्लाउड नेटवर्क के सामान्य व्यवहार को समझने का प्रयास करेगी। कौन सा डेटा कितनी मात्रा में और किस तरह एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाता है, कौन-से उपयोगकर्ता सामान्य समय में लागिन करते हैं।
किस प्रकार की गतिविधियां नियमित रूप से होती है, इसका पैटर्न मशीन लर्निंग के जरिए तैयार किया जा सकता है। इसके बाद यदि अचानक इस सामान्य पैटर्न से अलग गतिविधि दिखाई देती है तो सिस्टम उसे पहचानकर अलर्ट कर सकता है। यानी मशीन ‘सामान्य’ क्या है और फिर ‘असामान्य’ को पकड़ने का प्रयास करेगी।
सिस्टम में केवल खतरे की सूचना देने के बजाय स्वचालित प्रतिक्रिया तंत्र भी प्रस्तावित है। संदिग्ध गतिविधि मिलने पर तय सुरक्षा नियमों के अनुसार संबंधित पहुंच को सीमित करने, संदिग्ध गतिविधि को अलग करने या सुरक्षा व्यवस्था सक्रिय करने जैसी कार्रवाई की जा सकती है। इससे खतरे का पता चलने और सुरक्षा प्रतिक्रिया के बीच लगने वाला समय कम करने का प्रयास होगा।
इस तकनीकी ढांचे में एलएसटीएम (लान्ग शार्ट-टर्म मेमोरी) और रैंडम फारेस्ट जैसे मशीन लर्निंग एल्गोरिदम के इस्तेमाल की परिकल्पना है। एलएसटीएम समय के साथ होने वाली गतिविधियों के क्रम को समझने में मदद कर सकता है। वहीं रैंडम फॉरेस्ट अलग-अलग संकेतों और आंकड़ों को देखकर गतिविधियों को सामान्य या संदिग्ध श्रेणी में पहचानने में मदद कर सकता है।
क्लाउड पर संवेदनशील डेटा रखने वाले अस्पताल, विश्वविद्यालय, सरकारी कार्यालय, बैंकिंग एवं वित्तीय संस्थान, उद्योग और अन्य संगठन इस तरह की सुरक्षा व्यवस्था से लाभ उठा सकते हैं। उदाहरण के लिए अस्पताल में मरीजों का रिकार्ड, विश्वविद्यालय में विद्यार्थियों का डेटा या किसी कंपनी में वित्तीय व व्यावसायिक जानकारी क्लाउड पर रखी है तो उस तक होने वाली असामान्य पहुंच पर निगरानी रखी जा सकती है।