
शिवम कृष्ण त्रिपाठी, नईदुनिया, चित्रकूट। भगवान श्रीराम की कथा भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के कई देशों की सांस्कृतिक परंपराओं में रची-बसी है। अलग-अलग देशों में रामायण को स्थानीय संस्कृति, कला और परंपराओं के अनुरूप विशिष्ट स्वरूप में प्रस्तुत किया जाता है।
थाईलैंड का रामायण प्रस्तुति समूह अपनी पारंपरिक ‘रामाकियन’ पर आधारित खोन नृत्य-नाटिका के माध्यम से भगवान श्रीराम के जीवन से जुड़े प्रसंगों का मंचन करेगा। इसमें स्वर्ण मृग का पीछा करने, सीता हरण और भगवान राम व रावण के बीच युद्ध के दृश्य प्रमुख होंगे।

थाईलैंड में रामायण को ‘रामाकियन’ के नाम से जाना जाता है। यह वहां की सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। भारतीय रामकथा से प्रेरित इस परंपरा में थाई संस्कृति, पारंपरिक वेशभूषा, नृत्य, अभिनय और विशिष्ट कलात्मक शैली का समन्वय देखने को मिलता है।
भोपाल से आए कार्यक्रम समन्वयक संजय मिश्रा ने बताया कि इस उत्सव के माध्यम से चित्रकूट के दर्शकों को न केवल भारतीय रामलीला की विविध शैलियों, बल्कि दूसरे देशों में प्रचलित रामायण के विशिष्ट स्वरूपों को भी देखने-समझने का अवसर मिलेगा। थाईलैंड की प्रस्तुति इसी अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक आदान-प्रदान का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
चित्रकूट में होने वाली यह प्रस्तुति दर्शकों को रामकथा के उस स्वरूप से परिचित कराएगी, जो भारतीय परंपरा से जुड़ा होने के बावजूद अपनी अलग सांस्कृतिक पहचान रखता है। थाईलैंड का यह प्रस्तुति समूह देश के उत्कृष्ट कलाकारों का प्रतिनिधित्व करता है।
उद्देश्य रामायण की परंपरा को जीवंत बनाए रखने के साथ थाई संस्कृति और कलात्मक विरासत को अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहचान दिलाना भी है। समूह की प्रस्तुतियां विभिन्न देशों के बीच सांस्कृतिक संवाद और आपसी संबंधों को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
लगभग 14 से 15 मिनट की इस प्रस्तुति में रिकॉर्डेड संगीत के साथ खोन नृत्य-नाटिका के माध्यम से रामकथा का मंचन किया जाएगा। खोन थाईलैंड की पारंपरिक मुखौटा नृत्य-नाट्य शैली है, जिसमें नृत्य, अभिनय, संगीत और आकर्षक वेशभूषा के जरिए कथा को जीवंत किया जाता है। इस कला को यूनेस्को ने मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के रूप में मान्यता दी है।
थाईलैंड की रामायण प्रस्तुति केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अपनी सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने और दुनिया के सामने प्रस्तुत करने का माध्यम भी है। पारंपरिक थाई शिल्प, कलात्मक कौशल और शाही दरबार से जुड़ी प्रस्तुति परंपराओं की झलक इस कला में दिखाई देती है।
चित्रकूट में आयोजित अंतरराष्ट्रीय श्रीरामलीला उत्सव भारतीय संस्कृति के आध्यात्मिक महत्व और रामकथा की वैश्विक लोकप्रियता को एक मंच पर लाने का प्रयास है। भारतीय रामायण परंपरा और थाईलैंड की ‘रामाकियन’ के माध्यम से यह आयोजन दोनों देशों की साझा सांस्कृतिक जड़ों को रेखांकित करेगा।
अंतरराष्ट्रीय श्रीरामलीला उत्सव के अंतर्गत 13 से 19 अक्टूबर तक रामकथा के विविध प्रसंगों पर आधारित प्रस्तुतियों का आयोजन किया जाएगा। कार्यक्रम सूची के अनुसार, विभिन्न तिथियों पर अलग-अलग प्रसंगों के माध्यम से भगवान श्रीराम के जीवन, आदर्शों और रामायण की सांस्कृतिक परंपराओं को मंच पर जीवंत किया जाएगा।
इन कार्यक्रमों के माध्यम से दर्शकों को भारत के विभिन्न क्षेत्रों की लोकनाट्य परंपराओं के साथ रामायण के अंतरराष्ट्रीय स्वरूपों को भी जानने का अवसर मिलेगा।
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