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13 साल बाद बर्खास्त कांस्‍टेबल को हाईकोर्ट से राहत, आदेश निरस्त होने से बहाली का रास्ता साफ

मामला दिनेश गुप्ता को प्रताड़ित करने और उसे रासायनिक पदार्थ पिलाकर आत्महत्या के लिए मजबूर करने के आरोपों से जुड़ा था। पुलिस अधिकारियों की गवाही को न्य...और पढ़ें

By Mayank MishraEdited By: Dheeraj kumar Bajpai
Publish Date: Sat, 19 Sep 2026 10:14:01 PM (IST)Updated Date: Sat, 19 Sep 2026 10:14:01 PM (IST)
13 साल बाद बर्खास्त कांस्‍टेबल को हाईकोर्ट से राहत, आदेश निरस्त होने से बहाली का रास्ता साफ
कोर्ट के अनुसार आरोपों को साबित करने के लिए आवश्यक विधिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं थे।

HighLights

  1. जबलपुर हाईकोर्ट ने किया बर्खास्तगी के आदेशों को निरस्त
  2. न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि बकाया वेतन का लाभ नहीं मिलेगा
  3. परिवार के सदस्य विभागीय जांच के दौरान पूर्व कथनों से मुकरे थे

नईदुनिया प्रतिनिधि, सतना। जिले में पदस्थ रहे कांस्‍टेबल वरुण द्विवेदी को बर्खास्तगी के करीब 13 साल बाद हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। जबलपुर हाईकोर्ट ने उनकी बर्खास्तगी के आदेशों को निरस्त करते हुए उन्हें परिणामी लाभ दिए जाने के निर्देश दिए हैं। न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि उन्हें बकाया वेतन का लाभ नहीं मिलेगा।

सेवा में बहाली का रास्ता साफ

जस्टिस विशाल धगट की पीठ ने 16 सितंबर 2026 को रिट याचिका क्रमांक डब्ल्यूपी-11360/2013 पर सुनवाई करते हुए 20 मार्च 2013, 2 मई 2013 और 17 जून 2013 को जारी किए गए दंड संबंधी आदेशों को निरस्त कर दिया। न्यायालय के इस निर्णय के बाद कांस्‍टेबल वरुण द्विवेदी की सेवा में बहाली का रास्ता साफ हो गया है।


न्यायालय ने विभागीय जांच में प्रस्तुत साक्ष्यों का परीक्षण किया

इन आरोपों के आधार पर विभागीय कार्रवाई करते हुए वरुण द्विवेदी के खिलाफ दंडात्मक आदेश जारी किए गए थे। इसके खिलाफ उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने विभागीय जांच में प्रस्तुत साक्ष्यों का परीक्षण किया।

आरोप साबित करने के लिए विधिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं

कोर्ट ने पाया कि जिस व्यक्ति को प्रताड़ित किए जाने का आरोप था, वह और उसके परिवार के सदस्य विभागीय जांच के दौरान अपने पूर्व कथनों से मुकर गए थे। वहीं पुलिस अधिकारियों की गवाही को न्यायालय ने सुनी-सुनाई प्रकृति का माना। कोर्ट के अनुसार आरोपों को साबित करने के लिए आवश्यक विधिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं थे।

न्यायालय ने याचिकाकर्ता को परिणामी लाभ का हकदार माना

इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने रिट याचिका स्वीकार करते हुए तीनों विवादित दंड आदेश रद्द कर दिए। न्यायालय ने याचिकाकर्ता को परिणामी लाभ का हकदार माना है। इसमें काल्पनिक वेतन वृद्धि और वरिष्ठता का लाभ शामिल है। हालांकि बर्खास्तगी अवधि का बकाया वेतन देने का आदेश नहीं दिया गया है।

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